समाज का उलाहना

यूं तो कोई कविता विचारों के रूप में मेरे मन में उद्गम करती है, फिर कुछ दिनों बाद शब्दों का आवरण धारण करके आपके सामने प्रस्तुत होती है। किंतु इस बार, पहली बार किसी कविता ने भावनाओं से शब्दों का रूप लेने में कुछ ज्यादा ही समय लगा दिया। ये भावनाएँ वाकई कठिन थींं। कुछ दिन विचारों में घूमकर, फिर पाँच दिनों तक शब्द-रूप लेने के बाद आज आपके सामने प्रस्तुत है कविता- समाज का उलाहना । विचार अवश्य रखें…

आज बड़े दिनों बाद अवकाश पाया!

कुछ थकावट-सी थी,

मैं खूब सोई, सुस्ताई;

काम करने का मन नहीं था कोई।

अपने लिए समय एक अरसे बाद पाया था।

मैं बैठी थी दोपहर में, 

बरामदे में झूले पर

कल की कल्पनाएँ कर रही थी।

बड़ा अच्छा लग रहा था

और शायद मैं कुछ भूल रही थी।

तभी एक जोर का तमाचा

गालों पर पड़ा मेरे!

झंकृत हुआ तब तन और मन,

मानो भयावह स्वप्न से जागी थी मैं!

बगलें झांकने लगी थी मैं,

डरी-सहमी सी थी मैं,

एकाएक कोई आवाज आई-

“मैं समाज हूं!”

इतना कह वह चूप हुई।

मैं अचंभित थी।

कुछ छः-सात तमाचे और पड़ गए।

कुछ बोलना तो दूर रहा,

ये तो समझ से परे था मेरे।

फिर समाज ने मानवीय रूप लिया,

कुछ चोटें खाया, बिमार-सा

फटे चिथड़ों में

दीन-सा लगता था।

लेकिन आवाज तटस्थ थी,

फिर बोला, मुझे फटकारा-

“लिखने को तो बड़ी-बड़ी बातें

तुम बेझिझक लिखती हो।

फिर जब बारी काम की आई,

अकर्मण्य बनी फिरती हो।

तुमने उस दिन भरे सदन में

मुझसे कुछ वादें किए थें।

नशा, गरीबी, अशिक्षा, गंदगी

आदि-आदि को मिटाने के कुछ इरादे किए थें।

केवल मनोरंजन और नाम को

तुम जनता के बीच में आई थी।

गहरी बातें और नेतृत्व से तुम

जन-जन के मन में छाई थी।

तुम्हारी एक पहल के कारण

बदलाव मुझमें भी लघु आया था।

चोटें भरती जा रही थीं मेरी,

मेरा अंतर्मन मुस्काया था।

धीरे-धीरे तुम व्यस्त हुई,

जैसे अपने ही जीवन में मस्त हुई,

या ऊब गई थी तुम

चोटों पर मेरी मरहम लगाते-लगाते!

कहीं हार तो नहीं रही थी तुम

मुझको अपने साथ चलाते-चलाते?”

इस प्रश्न से मैं भयाक्रांत हुई।

किंतु सत्य से दूर जाऊं कहाँ?

तब खुद के बचाव की खातिर

मैंने समय का हीला देना चाहा।

इतने में एक और तमाचा

पहले से रक्तिम गाल पर पड़ा मेरे।

उसे पहचानते मुझे अब देर न लगी,

अब समय समक्ष खड़ा था मेरे।

बोला, “तुम मेरा दुरुपयोग न करो,

न ही मुझको बदनाम करो तुम!

मेरा तो स्वभाव है चलते रहना

उठो, बढ़ो, मेरे साथ चलो तुम!

मेरी अवहेलना, मेरी शिकायत

अकर्मण्य लोग ही करते हैं।

किंतु सच सुनो, समाज सेवा तो

स्वत्व त्यागने वाले करते हैं।”

 इनकी सत्य-कटू बातों ने

आज मेरा मद चूर किया है।

याद दिलाकर बिता कल मुझको

आत्मचिंतन को मजबूर किया है!
-आरती मानेकर

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17 thoughts on “समाज का उलाहना

  1. बहुत बढिया कविता —-समाज का अच्छा रूप दिखाती आपकी कविता।काश ये थप्पड़ किसी और को पड़ती।हमसब तो सिर्फ लिख कर अलख जगा सकते हैं जो आपने किया।कोई बात नही कलम तलवार से काफी तेज होती है।

    Liked by 1 person

    1. बहुत धन्यवाद मित्र….सच कहूँ तो ये तमाचा मुझे ही पड़ा है, क्योंकि ऐसा ही कुछ प्रयास मैंने भी किया था… किन्तु कुछ कारणवश मैं काम पूरा नहीं कर पाई..

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