चावल का दाना

अक्षत, अक्षय, अखण्ड, अनाज वह

देवों को अर्पित होता है,

वही बन के रोली रक्षाबंधन पर

भाई के माथे पर सुहाता है।

उत्सर्ग के क्षण बनके धान वह,

धरती के सीने पर लहराता है।

चार दाने चावल ही कभी

शुभकार्यों का निमंत्रण बन जाता है।

माँ की रसोई में खुशबू बिखेर,

पिताजी की थाली में खिलखिलाता है।

भाभी की पहली रसोई के दिन

खीर का स्वाद बढ़ाता है,

अन्य अनाजों के संग सांझा कर

कितने ही पकवान बनाता है।

देर रात काम से लौटे बेटे के
उदर का आधार बन जाता है।

 पुण्यवचन के चावल का दाना,

किसी का उपवास पूरा करवाता है।

फिर क्यों विवाह के सुक्षणों में

पैरों के नीचे रौंदा जाता है?

व्यर्थ अनाज का यह परिमाण

दीनों की क्षुधा नहीं मिटाता है!

और देखो हमारे ‘सभ्य’ समाज को

बेकार परंपराओं पर इतराता है!

मंगलाष्टक के क्षण, अक्षत का स्थान

पुष्प-दल भी तो ले सकता है;

सच है, नई सोच को अपनाकर ही

परिवर्तन लाया जा सकता है!

-आरती मानेकर

36 thoughts on “चावल का दाना

  1. ईतनी रचनात्मक बाते और संदेश वोभी चावल के बारे मे ,
    र्सीफ आरती मानेकर की कवीताऔमें ही मील सकती है।
    Im forwarding this poem to my hindi teacher. Thanx for write this. 👌👌📷

    Liked by 1 person

  2. chawal ke Dane ki kya bat Kahi he
    Jamane ke parmparao ki kya dasta likhi he
    Ye galib kya khub likha he tune chawl ke liye
    Baki jamana to chawal Ko sirf ek an ka Dana samjhti he ……. Sirf ek an ka Dana samjhti he

    Nice poetry

    Liked by 1 person

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