फ़नकार का जवाब

मुझे मिटा दिया, ये सोचकर, तुम जी रहे होंगे बड़ी राहत में,
लेकिन फ़नकार मरते नहीं फ़ना हो जाते हैं, फ़न की चाहत में!
तुम मुझे मार सकते हो, लेकिन मेरे जज़्बात का क्या?
मेरी कलम तोड़ दो, लेकिन उसके रोशनाई से निस्बत का क्या?
कागज़ तुम जो फाड़ दो सारे, तो फ़लक ज़मीन हो मेरे लिए,
जो मैं लिख दूँ फिर कोई गज़ल, तुम इतने हैरान हो किस लिए?

मैं अभी मर नहीं सकता कि नज़्में जावेद लिखना बाक़ी हैं,
तेरी हार और मेरी फ़तह की हसीं नावेद लिखना बाक़ी है।
दहर के दिल पर इश्क़ के अल्फ़ाज़ लिखना बाक़ी हैं,
आसमां से ऊपर उठने वाली परवाज़ लिखना बाक़ी है।बदल दूँ मैं ज़माने की चाल को, ऐसे मेरे ख़यालात लिखना बाक़ी हैं,
चर्चें तुम मेरे नाम के सुनो, उस वक़्त के तुम्हारे हालात लिखना बाक़ी हैं!
नौनिहालों को सुना सकूँ, वो किस्सा लिखना बाक़ी है,
मेरे मुल्क के फ़रोग़ में मेरा हिस्सा लिखना बाक़ी है!

-आरती मानेकर

The poem may seem weird to you, as it is the sequence to my previous poem. To understand this one, you must read my previous poem. Here is the link- कलाकार से प्रतिशोध .

Thank you…

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