हम नासाज़ हैं एक जमाने से…

हम नासाज़ हैं एक जमाने से…

मिल लो, कि हम ठीक नहीं होंगे, फोन पर हाल बताने से।
देख लो, तुम देर ना करना, हम नासाज़ हैं एक जमाने से।।

तुम आओ तो छू भी लेना, हमारी आदत पर ना जाओ।
तुम नज़र तक तो नहीं हटाते हो, हमारे इतना शर्माने से।।

तुम चूमो, गालों को, लबों को, माथे को, बेहद ही चूमो।
गिना नहीं जाता है इश्क़ को, किसी भी भौतिक पैमाने से।।

हम देने लगें हैं ख़ुद ही इम्तिहान और सबूत सारे।
तुम बाज तो आते नहीं हो, बार-बार हमें आज़माने से।।

धीरे-धीरे बाँधी जाती हैं क़ामयाबी तक की सीढ़ियाँ।
इंसान अमीर नहीं होता, एक ही दिन में लाख कमाने से।।

सब्र रखो, कोशिश करो, कि हम पर हक़ फ़क़त तुम्हारा है।
कोई रोक तो सकता है नहीं, नदी को समंदर में समाने से।।

हमने लिखी है ग़ज़ल, तो तुम तारीफ़ ही कर डालो।
हम भी वाहवाह करेंगे, तुम्हें रोका किसने है फ़रमाने से।।

-आरती मानेकर

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