वज़ह

भूल जा मुझको ऐ शहर दीवाने
भूल जा मुझको ओ दोस्त मस्ताने
भूलना मुझको मेरे जन्मदाता
भूलना मेरी भगिनी और भ्राता।

माँ तेरे अंक पर ना मैं कलंक हूँ
ना ही प्रेमरस की मैं कोई मलंग हूँ।

बात ये थी कि
मेरा दिल परेशान था,
अस्तित्व पर खुद के जैसे
खुद ही शर्मसार था।

तात तेरी डाँट ने
मुझको खूब रुलाया था,
रात्रि नेत्र जागते
बस तेरे डर का साया था।

दूर जा रही हूँ अब
मैं तुम्हारे सायों से,
ढूंढने की मुझको अब ना
करना व्यर्थ कोशिशें।

मेरे गंतव्य की ना मुझे खबर है,
जिद्द में लेकिन मेरी असर है।

ना समझ कि मैं रंच भी गलत हूँ,
आत्म- हानि से भला है, तुमसे मैं पृथक् हूँ।

-आरती मानेकर

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Likhne De

कलम ने कहा मुझे कागज से मिलने दे…
दोस्ती की एक नई दास्तां लिखने दे…
विश्वास का नाम दोस्ती ये सब जानते हैं..
आज इस तथ्य को सत्य लिखने दे…
लिखने दे दिल की बातें.. कुछ मुलाक़ातें लिखने दे…
कभी न टूटे वादा ऐसा साथ लिखने दे..
दर्द पर हो मरहम उसके ऐसी आह लिखने दे…
कोई ख़्वाहिश न रहे बाकी ऐसी चाह लिखने दे..
मिलना है उससे हर रोज़ मुझे ऐसा ख़्वाब लिखने दे..
उसके कुछ अनकहे सवालों का जवाब लिखने दे…
लिखने दे…
दोस्ती का फिर इतिहास लिखने दे..☺️
-आरती मानेकर

Preet ki Holi

होली के दिन
धवल वस्त्र में
भर हाथ में रंग
और भर पिचकारी
रंग देना तू
नख-शिख मेरा
और रंग देना मेरी चोली
पिया ऐसे खेलना होली।
रंग लाल प्रीत का
गोरे गाल पर
ऐसे लगा तू
थाम कलाई मेरी
रंग न छूटे
और जग देखे
मैं बोलूं प्रेम की बोली
ऐसी हो प्रीत की होली।
साथ तेरा हो
मन मगन मेरा
हुआ चंदन बदन
उर बना फुलवारी
तेरे हाथ से
प्रेम रस पीकर
रीत जग की मैं भूली
ले तेरी मीत मैं हो ली।
-आरती मानेकर
होली की शुभकामनाओं के साथ…