आधा-आधा

आधा-आधा दिन बीता है,

आधी-आधी रात है बाकी,

पहले संध्याएँ सजा करतीं थीं;

अब आधे ही मित हैं बाकी!
आधी थी, जब भूख लगी थी

आधी ही माँ ने रोटी दी थी।

स्वास्थ्य पतन भी आधा हुआ है,

आधा ही अब उदर है बाकी!
आधी बढ़ी, फिर ज्ञान-पिपासा;

मुझमें बढ़ी फिर आधी-आधी;

समय बढ़ा, गुरु दूर हुए,

रही ज्ञान की प्राप्ति बाकी!
आधी उम्र में लगन लगी है,

प्रेम की अभिव्यक्ति है बाकी।

कल्पनाएँ तो खूब हुईं हैं,

प्रिय से मिलन आधा है बाकी!
आधा ही जीवन, आधी ही मैं

राह चलना फिर भी है आधी।

प्रयास कभी रहे नहीं आधे,

मंजिल मिलना केवल है बाकी!
दो दशक बीते, अलभ्य रहा सब

आधे-आधे अवसर हैं बाकी।

किंतु स्वप्न प्राप्त करने को

अर्धशति अब भी है बाकी!
कभी शब्दों का सैलाब उमड़ा था,

रहा विचारों का कहीं युद्ध बाकी।

कोई कलम चुरा ले गया है मुझसे;

आधे ही मुझमें भी भाव हैं बाकी!
-आरती मानेकर

Advertisements

Book Review: Oh My Goddess!

Author: Rohan Govenkar 
Genre: Fiction 

Publisher: Frontier India

Format: Paperback 
Pages: 285

About the Author: Rohan Govenkar is a self-taught creative writer who has taken to writing not as profession, but as passion. After having completed his education in Geological Sciences in Goa, Rohan joined the family business of retail and distribution. Simultaneously, he took up a challenge of learning three subjects of his interests all by himself, sans the formal education, and only by referring to books. The first subject was Business Management and the second one was the Stock Market. Creative writing was the third one which Rohan pursued at later stages, after the discovery of his real passions. Another subject that Rohan concerns himself with is his home-state, Goa, and he remains pro-active with many social matters pertaining to Goa.

Introduction of the story: The biggest dream in Naveen’s life, at this point, is to get Jessica attracted to him. Stunningly beautiful and incredibly proud, Jessica is his millionaire boss’s daughter; and Naveen believes that the chances of her falling for an ordinary, middle-class guy such as him are miniscule, unless…

… they are both locked up together, in a romantic setting, isolated from the outside world. So an obsessed Naveen hires goons to nab Jessica, fake his own kidnapping and keep them both as hostages in a rented, plush villa in Aldona village. The motive is disguised as ransom.

While Naveen tries to make quality time with the terrified Jessica, he notices that the villa has some of its own secrets that could annihilate his chances. The house happens to be a location for a horror video-prank set up by two mischievous boys from Mumbai, and is bugged with all sorts of gadgetry and ghoulish props.

What happens next is pure adventure that leaves Naveen to his wit’s end. Will everything go in accordance with Naveen’s carefully laid-out plan? Or will he end up in jail? To find out more, do check out this page-turner of an exciting romantic thriller that will make you go ‘Oh My Goddess!’

My views: The amazing book cover and the name of the book simply draw readers’ attention. It’s a love story, actually a complicated love story of one side lover. Goa is in the background of the story. Naveen is the leading character here, who has just so many dreams to fulfill and the biggest dream is to get his boss’s daughter Jessica attracted to him. As in every love story people do crazy things to get love, so as Naveen did. And whatever he did, you will read in the book. And that very incident makes the story kinda funny, kinda romantic and kinda adventurous. Means many flavors in just one book together. The author narrated the story in a very simple and engaging language and style. Enough characters who played vital role in the story and all the characters were just original. Starting was kinda confusing…. As I have read the first 2 chapters twice (I don’t know whether you will read it twice or only once), but at the end, I couldn’t predict the story, as suspense was there till the end….
Conclusion: Overall….an amazing book, you can spend your weekend reading to…

Star Rating: 5/5
Book link: Get your copy from here… Oh My Goddess!

Thanks for reading…

Stay connected….

-Arti Manekar

समाज का उलाहना

यूं तो कोई कविता विचारों के रूप में मेरे मन में उद्गम करती है, फिर कुछ दिनों बाद शब्दों का आवरण धारण करके आपके सामने प्रस्तुत होती है। किंतु इस बार, पहली बार किसी कविता ने भावनाओं से शब्दों का रूप लेने में कुछ ज्यादा ही समय लगा दिया। ये भावनाएँ वाकई कठिन थींं। कुछ दिन विचारों में घूमकर, फिर पाँच दिनों तक शब्द-रूप लेने के बाद आज आपके सामने प्रस्तुत है कविता- समाज का उलाहना । विचार अवश्य रखें…

आज बड़े दिनों बाद अवकाश पाया!

कुछ थकावट-सी थी,

मैं खूब सोई, सुस्ताई;

काम करने का मन नहीं था कोई।

अपने लिए समय एक अरसे बाद पाया था।

मैं बैठी थी दोपहर में, 

बरामदे में झूले पर

कल की कल्पनाएँ कर रही थी।

बड़ा अच्छा लग रहा था

और शायद मैं कुछ भूल रही थी।

तभी एक जोर का तमाचा

गालों पर पड़ा मेरे!

झंकृत हुआ तब तन और मन,

मानो भयावह स्वप्न से जागी थी मैं!

बगलें झांकने लगी थी मैं,

डरी-सहमी सी थी मैं,

एकाएक कोई आवाज आई-

“मैं समाज हूं!”

इतना कह वह चूप हुई।

मैं अचंभित थी।

कुछ छः-सात तमाचे और पड़ गए।

कुछ बोलना तो दूर रहा,

ये तो समझ से परे था मेरे।

फिर समाज ने मानवीय रूप लिया,

कुछ चोटें खाया, बिमार-सा

फटे चिथड़ों में

दीन-सा लगता था।

लेकिन आवाज तटस्थ थी,

फिर बोला, मुझे फटकारा-

“लिखने को तो बड़ी-बड़ी बातें

तुम बेझिझक लिखती हो।

फिर जब बारी काम की आई,

अकर्मण्य बनी फिरती हो।

तुमने उस दिन भरे सदन में

मुझसे कुछ वादें किए थें।

नशा, गरीबी, अशिक्षा, गंदगी

आदि-आदि को मिटाने के कुछ इरादे किए थें।

केवल मनोरंजन और नाम को

तुम जनता के बीच में आई थी।

गहरी बातें और नेतृत्व से तुम

जन-जन के मन में छाई थी।

तुम्हारी एक पहल के कारण

बदलाव मुझमें भी लघु आया था।

चोटें भरती जा रही थीं मेरी,

मेरा अंतर्मन मुस्काया था।

धीरे-धीरे तुम व्यस्त हुई,

जैसे अपने ही जीवन में मस्त हुई,

या ऊब गई थी तुम

चोटों पर मेरी मरहम लगाते-लगाते!

कहीं हार तो नहीं रही थी तुम

मुझको अपने साथ चलाते-चलाते?”

इस प्रश्न से मैं भयाक्रांत हुई।

किंतु सत्य से दूर जाऊं कहाँ?

तब खुद के बचाव की खातिर

मैंने समय का हीला देना चाहा।

इतने में एक और तमाचा

पहले से रक्तिम गाल पर पड़ा मेरे।

उसे पहचानते मुझे अब देर न लगी,

अब समय समक्ष खड़ा था मेरे।

बोला, “तुम मेरा दुरुपयोग न करो,

न ही मुझको बदनाम करो तुम!

मेरा तो स्वभाव है चलते रहना

उठो, बढ़ो, मेरे साथ चलो तुम!

मेरी अवहेलना, मेरी शिकायत

अकर्मण्य लोग ही करते हैं।

किंतु सच सुनो, समाज सेवा तो

स्वत्व त्यागने वाले करते हैं।”

 इनकी सत्य-कटू बातों ने

आज मेरा मद चूर किया है।

याद दिलाकर बिता कल मुझको

आत्मचिंतन को मजबूर किया है!
-आरती मानेकर