काली कमाई…😂

हमारे प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी द्वारा लिए गए आज के इस ऐतिहासिक फैसले की वजह से काले धन वाले किसी व्यक्ति की मनोदशा कैसी है, उसी की दृष्टि में व्यंग्य रूप से इस कविता के माध्यम से देखते हैं:

मुझको उपकारी बनाने की,
                        हे मोदी! तुमको क्या सूझी?

सच कहता हूँ कल रात

                        मेरे घर की बत्ती नहीं बुझी।

पूरी जिंदगी बिता दी मैंने

                        धन इतना बनाने में।

आज लूटा रहा हूँ पैसा मैं;

                        मंदिर, मस्जिद, मयख़ाने में।

आज सवेरे मन्दिर जाकर मैंने

                       जो लक्ष दान की थी ठानी।

“रख काली कमाई जेब में तू”

                       कह रही थी भगवन की वाणी।

मन्दिर के बाहर दीन था, मैं बोला,

                      “तू मांग, आज मेरा धन ले ले”।

वो बोला, “न नोट हजारों के,

                        तू केवल मुझे दुआएँ दें”।

घर आकर के चूल्हे में मैंने

                        थी नोटों से आग जलाई।

तन की ठण्ड तो मिट गई,

                       भस्म हुई मेरी काली कमाई।

कल तक धनवान बना फिरता मैं,

                       एक रात में कंगाल बना डाला।

मैं तो सोया नहीं सारी रात मगर,

                       मीठी नींद सोया होगा हर ग्वाला।

स्वच्छ भारत का वो सपना,

                        मानो अब साकार हो रहा।

जो पड़ा हुआ था तिजोरी में,

                        वो धन काला साफ हो रहा।

एक दिन काले रुपये सारे,

                        जब गंगा में बह जाएंगे।

मोदी तेरी नीति से फिर

                        अच्छे दिन आ जाएंगे।

-आरती मानेकर

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मीठी पड़ोसन

एक तो मेरे घर पर
एक किराने की दुकान,
उस पर मेरी मीठी पड़ोसन
हाय! मुझपर वो मेहरबान।

हुई भोर और आयी वो
मेरी छोटी-सी दुकान पर,
मैं तो मलंग हो जाता हूँ
उसकी मधुर मुस्कान पर।

तेल, मसाले, चीनी, गुड़,
दाल, चावल
एक लंबी-सी फेहरिस्त है;
“भिजवा देना सामान घर पर”
कहती मेरी पड़ोसन
हाय!उसकी बोली बड़ी मस्त है!

दोपहर तक जो सामान न भेजूँ
तो उसका संदेशा आता है,
“भिजवा दो न जल्दी”
उसका लिखा हुआ मुझे भाता है।

बर्फी, गुजिया, मालपुवे,
खीर, हलवा, लड्डू, घेवर,
शाम को आयी मीठी खुशबू
फिर मेरी दुकान पर।

अब लगता है वो आएंगी
लेकर पैसे और पकवान,
मेरी बस एक इतनी अर्जी
मान ले ओ मेरे भगवान।

आठ बज गए, न आयी वो
न ही लाती पैसे,
इतने सारे सामान का मैं
अब दाम निकालूँ कैसे?

दिल तोड़कर मेरा वो
रोज खाती मीठे पकवान,
इधर उधारी के बोझ से
टूट रही मेरी दुकान।

फिर न आयी वो दुकान पर
हुआ प्यार का मेरे देहावसान,
अरी! प्यार न दे, पैसे तो दे
इतना कर दे तू मुझपर अहसान।

आरती मानेकर

At a special demand, I tried my hand in comedy for the very first time…
Hope you guys will like it…
Comment must and let me know “should I write comedy too? “
Thanks. 😊