मुझसे अनजान नहीं था…

वो भूले थे आज मुझे इबादत में, सजदे में,
जिनके लबों पर कभी दूसरा नाम नहीं था।

मैं देखती रही राह, वो ना आए मेरी गली में,
शायद उन्हें मुझसे आज कोई काम नहीं था।

मुझे तोहफ़ा तो मिल जाता, उनकी हाजिरी में;
मेरी खुशियों का इतना तो बड़ा दाम नहीं था।

वो हिचकिचाए होंगे, दिल की दौलत लुटाने में,
लगता है, टीक सके; ऐसा उनका ईमान नहीं था।

चर्चे थे हमारी मोहब्बत के, उनके शहर में
इस बात का तो मुझे कोई गुमान नहीं था।

शायद हुए थे वो मशगुल, मुझको आजमाने में
क्या मेरा प्यार उनकी जागिर, उनका सामान नहीं था?

ताउम्र के लिए मांगा है, मैंने उनको दुआ में
उनका दिल मेरे सीने का सिर्फ मेहमान नहीं था।

है फर्ज कि साथ दे दूँ, उनके हरेक फैसले में
मैं अव्वल हूँ कि हार जाऊँ, कोई इम्तिहान नहीं था।

खताएँ खूब गिनवाईं मेरी, कल उन्होंने वकालत में;
मोहब्बत खोने के डर से दिल शायद परेशान नहीं था।

मोहब्बत खून-सी रोई, तमाशबीनों की महफ़िल में
क्या मेरी तरह यार मेरा, एक इंसान नहीं था?

क्या इल्ज़ाम लगें मुझपर, नहीं इंसाफ अदालत में
मेरा किरदार शहर में, कभी इतना बदनाम नहीं था।

मिली सजा अजनबी को, मोहब्बत की उस शहर में,
कोई शख्स जिस शहर में मुझसे अनजान नहीं था।

-आरती मानेकर

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#LoveLife

I wanna be the Queen,
Not the Slave.
Love must be floral Garden,
Must not the Cave.
Your love with all the Respect,
Is for what I Crave.
But our love couldn’t be Heaven,
No, I won’t Rave.

-Arti Manekar

सुकून

देख रहे हो ना!
उस तस्वीर में,
तुम्हारी परछाई को
प्रतिबिंबित करते
मेरे माथे पर सजे
कुंदन को!
मेरी पलकों के
गिर जाने से
बंद हुईं
मेरी लजाती आँखों को!
तुम्हारे चूमने से
गर्द हुए
मेरे फुले गालों को!
मेरे होठों के कोरों के
थोड़ा और फैल जाने से
बनी
मेरी उस मुस्कान को!
तुमने अपने हाथों से
सँवारे,
काँधे पर बिखरे पड़े
मेरे बालों को!
तुम्हारी अंगुलियों को
अपने में समाहित किए
बंद मेरी मुट्ठी को!
सीने से सरककर
जमीन पर गिरे
मेरे खादी के
हरे वाले दुपट्टे को!
द्योतक हैं वे सब
सुकून के!
उस सुकून के
जो मैंने पाया है,
तुम्हारे सीने से
लग जाने से,
तुम्हें पाने से!
वो क्षण अद्भुत था,
जब हँसी और आँसू
एक साथ आए थे
चेहरे पर मेरे!
सुकून दर्शाने को!
तुम्हें पा जाने का;
तुम्हें सीने से
लगाने का!
कभी झल्ला दूँ
तुमपर,
या लड़ लूँ
किसी दिन तुमसे,
और फिर मनाऊँ
आप ही तुमको,
या सहम जाऊँ
या हँस दूँ
तुम्हारी डाँट पर,
तो हैरत मत करना।
कि यह भी सुकून है!
कि हक़ है मेरा
तुम पर,
तुम्हारे प्यार पर!
यह हक़ मेरा
बरकरार रखना।
सुकून है
तुम्हारे प्यार में।
जैसा है आज
वैसा ही कल
अपना प्यार रखना!
-आरती मानेकर

पहले मिलन की बात

तेज-तेज बढ़े थे कदम
और साँसें यकायक बढ़ रही।
बैचैन हो चला था मन
और अधरों पर थी खुशी।
पहले मिलन की बात थी,
कि आँखें ढूँढ़ती रहीं;
साक्षात देख सजन को
थी सजनी मौन रही।
अधरों से बोला न गया
बातें किंतु न चुप रहीं।
खोए थे ऐसे वे कि
आँखें उनकी बोलती रहीं।
प्रेमालिंगन हुआ था ऐसा
बाहें थीं, फूलमाल नहीं।
कितने सुंदर लगते थे वे,
यथा उर का आकार यही।
मस्तक पर कोमल चुम्बन
यह प्रेम से पृथक् था नहीं।
समय रुका हुआ लगता था,
निशा को कदाचित जल्दी नहीं।
एक थे उनके तन-मन सारे,
दो हाथों की मुट्ठी एक बनी रही।
अनामिका में अंगुठी तब से
प्रेमाभिव्यक्ति का प्रमाण बनी रही।
श्रृंगार किया सजन ने नख-शिख का,
थी सजनी शर्म से लाल हो रही।
पायल टूटी फिर उतावलेपन में,
किन्तु उसकी झंकार बनी रही।
भास्कर सम तेज़ था उनका,
‘आरती’ वो भी जलती रही।
उष्णता, शीतल रात में इतनी;
थी प्रेम का उत्पाद वही!
प्रेमोन्माद में थे वे दोनों,
आँखें सारी रात जागती रही।
खूब चाँदनी बिखरी धरा पर,
वो इस मिलन को निहारती रही।
कितनी खुशी, कई सारी बातें,
अश्रुलडीं भी न निःस्पर्श रही।
स्मृति इन अमूल्य क्षणों की,
थी तस्वीरों में कहीं-कहीं।
वियोग के क्षण आँखें न मिलींं;
खूब रोईंं, निर्झर बनी रहींं।
प्रेम के इस अपरिचित शहर में
प्रेमपूर्ण उर धड़के थे कहीं!
चिरायु हो वो प्रेमी युगल, कि
शुभकामना जग की बनी रही।
हो वर्णन इस प्रेम मिलन का,
मेरे शब्दों में वो बात नहीं!
-आरती मानेकर

मिलन का उतावलापन

थका बदन

आँखें उनींदी

गवाही दे रहे हैं

तुम्हारे लिए

मेरे प्यार की।

सारी रात किए

तुमसे मिलन के

इंतजार की।

कुछ उतावलापन है,

कुछ घबराहट

हरकतें बचकानी हैं,

प्यार, तुम्हारे यार की!

बाहें हार बनी

कदम तेज हैं,

गालों पर हया;

धड़कनें बढ़ रही हैं

दिल-ए-नादां की!

लबों ने सजाई 

मुस्कान प्यारी है,

मिलो तो चूम लेना।

ये बात है मेरे

अपने खयाल की।

मेरी मुस्कान

तुमसे दगा करेगी;

पिया! आँखों में

देखना तुम मेरे।

आँखें सुनती नहीं है,

बातें जुबां की।

आँखें सूजी हैं,

रात बहुत रोई हैं,

जरूरत खूब है अब

यार के दीदार की।

वक्त बीते जा!

अल्फ़ाजों सो जाओ!

मिलन के बाद

दास्तां लिखूँगी मैं,

मिलन वाली शाम की।

-आरती मानेकर

प्यार वाला किस्सा

खूब व्यस्त जान पड़ते हो!

कोई बात नहीं!

फुरसत जब मिलेगी,

तो याद कर लेना।

मैं दौड़ी चली आऊंगी,

एक संदेश लिख देना।
कुछ शिकायतें करनी हैं तुमसे,

ताने भी मैं सौ-सौ दूंगी,

फेहरिस्त बना रखी है,

विस्तृत ब्यौरा भी मैं दूंगी।
चुप्पी क्यों साधी है तुमने?

क्या कोई गलती मुझसे हुई थी?

मुझे तो जिंदगी-सी जान पड़ी थी,

उस दिन जो हमारी बातें हुईं थीं। 
तबसे दिन जरा बदले-से हैं,

मेरे नाम की रट सुनाई नहीं देती!

दिन-दिनचर्या में बीत है जाता,

मैं ही जानूँ, मेरी रात कैसे बीती!
मन कल्पनाओं से भ्रमित हो रहा था,

बुनने लगा था क्रोध का ताना-बाना,

एकांत में रोना अच्छा लग रहा था,

भाता नहीं था कोई अन्न का दाना।
मैं पहले रोती तो नहीं थी,

प्यार में भी तो नहीं थी पहले!

मैं हठी, थोड़ी पगली-सी हूँ,

तुम बनो समझदार, अच्छे-भले।
क्यों तुमको खलता है ना

मेरा गैरों से बातें करना?

मुझको भी बुरा लगता होगा,

मैं भी तो मन रखती हूं ना!
माना कि यह व्यस्तता तुम्हारी

अपने बेहतर कल के लिए है!

किंतु उन लम्हों को सजाऊँ कैसे,

जिनमें हम-तुम नहीं मिले हैं?
आओ ना, थोड़ा समय पाकर,

अब इतना भी मत सताओ,

डांटो थोड़ा, थोड़ा प्यार भी दो,

मुझ पर प्यार का अपने हक़ जताओ!
मैं तुम्हारी जिन्दगी की कहानी का 

प्यार वाला किस्सा हूँ,

हां, दूर जरूर हूँ तुमसे मैं,

लेकिन मैं भी तो तुम्हारा हिस्सा हूँ…!
-आरती मानेकर

बेईमान अल्फाज़

मैंने जब गम लिखना चाहा

तुमने आंसुओं को आवाज दी,

खुशी बांटनी चाही जग से

अहसासों को तुमने पहचान दी।

 

जग के हित की बात लिखकर

बने मेरी तटस्थ पहचान तुम,

फिर जब बारी इश्क की आई,

हुए क्यों मुझसे बेईमान तुम?

 

बात तो बस इतनी-सी थी न,

कि मुझे उनसे मोहब्बत हो चली थी!

लेकिन तुम यों खफ़ा हुए।

क्या मैं तुमसे कहीं दूर चली थी?

 

सच कहूं, तुम्हारी सारी बातें,

मेरे पिया चाव से पढ़ते हैं।

तुम दिल हो मेरा, वो जानते हैं,

वो भी तुमको ही खुदा मानते हैं।

 

गलतफहमी तो अब दूर हुई,

तुम वापस जिंदगी में आओ न!

लिखूंगी इश्क मैं मेरा-तुम्हारा,

तुम भी अपनी वफा जताओ न!

 

-आरती मानेकर