हम नासाज़ हैं एक जमाने से…

हम नासाज़ हैं एक जमाने से…

मिल लो, कि हम ठीक नहीं होंगे, फोन पर हाल बताने से।
देख लो, तुम देर ना करना, हम नासाज़ हैं एक जमाने से।।

तुम आओ तो छू भी लेना, हमारी आदत पर ना जाओ।
तुम नज़र तक तो नहीं हटाते हो, हमारे इतना शर्माने से।।

तुम चूमो, गालों को, लबों को, माथे को, बेहद ही चूमो।
गिना नहीं जाता है इश्क़ को, किसी भी भौतिक पैमाने से।।

हम देने लगें हैं ख़ुद ही इम्तिहान और सबूत सारे।
तुम बाज तो आते नहीं हो, बार-बार हमें आज़माने से।।

धीरे-धीरे बाँधी जाती हैं क़ामयाबी तक की सीढ़ियाँ।
इंसान अमीर नहीं होता, एक ही दिन में लाख कमाने से।।

सब्र रखो, कोशिश करो, कि हम पर हक़ फ़क़त तुम्हारा है।
कोई रोक तो सकता है नहीं, नदी को समंदर में समाने से।।

हमने लिखी है ग़ज़ल, तो तुम तारीफ़ ही कर डालो।
हम भी वाहवाह करेंगे, तुम्हें रोका किसने है फ़रमाने से।।

-आरती मानेकर

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वो मेरे शब्दों में दिखता है

मोहब्बत में ना चलो चालें, इसका सीधा रासता है,
तू उसको देख करके हँस, जो तुझे पाकर के हँसता है।
तुम बैठे हो मुझे पढ़ने, मैं उसका नाम नहीं लूँगी,
मैं उसका जिक़्र क्या कर दूँ, वो मेरे शब्दों में दिखता है।

वो मेरी रात का चन्दा, दिन के सूरज-सा है,
मुझे उसकी जरूरत है, वो मेरा बेगरज-सा है,
वो मेरी जिंदगी में है, ख़ुदा के तोहफ़े की तरह,
कि उसका नाम मेरे दिल पर अमिट दरज-सा है।

मैं उसको शिव ही कह दूँ तो कोई जिद्दत नहीं होगी,
सच कहती हूँ मेरे इश्क़-सी तेरे इश्क़ में शिद्दत नहीं होगी,
महीने आठ हैं बीत गए, जब उसका दीदार किया मैंने,
कि इससे लम्बी किसी के मिलन की मुद्दत नहीं होगी।

तुम उसका जिक़्र करते हो, मैं कितना शरमाती हूँ,
देखा तो होगा तुमने मैं अकेले में कैसे मुस्कुराती हूँ।
मैं कली हूँ अधखिली, वो जरूर ही धूप है!
कि उससे मिलते ही मैं फूल बनके खिलखिलाती हूँ।

सुनो एक राज की है बात, मैं फ़क़त तुमसे कहती हूँ,
मैं अपने घर से ज़्यादा अब उसके ख्यालों में रहती हूँ।
एक दिन उसकी बाहों में सुकून मिलेगा बहुत ज़्यादा,
बस इसी उम्मीद में आज मैं उससे दूरी ये सहती हूँ।

उसका जिक़्र कर पाऊँ, मैं ऐसी ग़ज़ल ढूँढ़ती हूँ,
उर्दू की ना मिलेगी, तो हिंदी में नई सजल ढूँढ़ती हूँ।
बसता है आँखों में मेरे, रोशनी है वो शायद,
अब नहीं मैं आँखों से गुम हुआ काजल ढूँढ़ती हूँ।

वो कुछ रूठा है मुझसे, मैं एक दिन उसे मनाऊँगी,
उस प्यार भरे दिल को मैं तब सीने से लगाऊँगी,
फ़िलहाल छोड़ो ये किस्सा, तुम वाहवाह कह डालो!
उसे मेरे पास आने दो, मैं अपनी वफ़ा जताऊँगी।

-आरती मानेकर

अजीब ही बदलाव देखा है…

मैंने देखी है तेरी मोहब्बत और तेरा ताव देखा है,
तेरी हँसती हुईं आँखें और दिल का हर घाव देखा है।

पाई तक ना लुटाए कोई , तू ख़ुद ही लूट जाए,
देखे हैं पैसेवाले ख़ूब, तुझ-सा न कोई राव देखा है।

कल आबाद थीं, आज सुनसान हैं, गलियाँ शहर की,
क्या मेरे अलावा भी किसी ने ये पथराव देखा है?

नफ़रत देखी है मैंने इस दहर के हर शहर में,
तुझमें! सिर्फ तुझमें, मोहब्बत का गाँव देखा है।

मैं अब तलक चलती रही, चलती रही और थक गई,
जहाँ पा लेती हूँ सुकून, तेरी गोद में वो ठाँव देखा है।

तू रूठा ना कर, मैं बुज़दिल बहुत हूँ,
मैंने तेरे बिना अपनी जिंदगी में ठहराव देखा है।

नाज़ुक हूँ मैं ही, फ़क़त तू कमजोर ना बन!
हर किसी ने काँच और पत्थर में टकराव देखा है।

तप रहा मेरा बदन था, सर्दी नहीं कम थी, ऐसे में
मैंने कल रात रजाई से बाहर तेरा पाँव देखा है।

एक दिन में सयानी हुई, कल नींद नहीं आई,
नादानी से अपनी ही, वक़्त-ए-अलगाव देखा है।

आज न कोई हँसी, न कोई आँसू ही नजर आया,
तेरे बर्ताव में मैंने ये अजीब ही बदलाव देखा है।

-आरती मानेकर

मुझसे अनजान नहीं था…

वो भूले थे आज मुझे इबादत में, सजदे में,
जिनके लबों पर कभी दूसरा नाम नहीं था।

मैं देखती रही राह, वो ना आए मेरी गली में,
शायद उन्हें मुझसे आज कोई काम नहीं था।

मुझे तोहफ़ा तो मिल जाता, उनकी हाजिरी में;
मेरी खुशियों का इतना तो बड़ा दाम नहीं था।

वो हिचकिचाए होंगे, दिल की दौलत लुटाने में,
लगता है, टीक सके; ऐसा उनका ईमान नहीं था।

चर्चे थे हमारी मोहब्बत के, उनके शहर में
इस बात का तो मुझे कोई गुमान नहीं था।

शायद हुए थे वो मशगुल, मुझको आजमाने में
क्या मेरा प्यार उनकी जागिर, उनका सामान नहीं था?

ताउम्र के लिए मांगा है, मैंने उनको दुआ में
उनका दिल मेरे सीने का सिर्फ मेहमान नहीं था।

है फर्ज कि साथ दे दूँ, उनके हरेक फैसले में
मैं अव्वल हूँ कि हार जाऊँ, कोई इम्तिहान नहीं था।

खताएँ खूब गिनवाईं मेरी, कल उन्होंने वकालत में;
मोहब्बत खोने के डर से दिल शायद परेशान नहीं था।

मोहब्बत खून-सी रोई, तमाशबीनों की महफ़िल में
क्या मेरी तरह यार मेरा, एक इंसान नहीं था?

क्या इल्ज़ाम लगें मुझपर, नहीं इंसाफ अदालत में
मेरा किरदार शहर में, कभी इतना बदनाम नहीं था।

मिली सजा अजनबी को, मोहब्बत की उस शहर में,
कोई शख्स जिस शहर में मुझसे अनजान नहीं था।

-आरती मानेकर

#LoveLife

I wanna be the Queen,
Not the Slave.
Love must be floral Garden,
Must not the Cave.
Your love with all the Respect,
Is for what I Crave.
But our love couldn’t be Heaven,
No, I won’t Rave.

-Arti Manekar

सुकून

देख रहे हो ना!
उस तस्वीर में,
तुम्हारी परछाई को
प्रतिबिंबित करते
मेरे माथे पर सजे
कुंदन को!
मेरी पलकों के
गिर जाने से
बंद हुईं
मेरी लजाती आँखों को!
तुम्हारे चूमने से
गर्द हुए
मेरे फुले गालों को!
मेरे होठों के कोरों के
थोड़ा और फैल जाने से
बनी
मेरी उस मुस्कान को!
तुमने अपने हाथों से
सँवारे,
काँधे पर बिखरे पड़े
मेरे बालों को!
तुम्हारी अंगुलियों को
अपने में समाहित किए
बंद मेरी मुट्ठी को!
सीने से सरककर
जमीन पर गिरे
मेरे खादी के
हरे वाले दुपट्टे को!
द्योतक हैं वे सब
सुकून के!
उस सुकून के
जो मैंने पाया है,
तुम्हारे सीने से
लग जाने से,
तुम्हें पाने से!
वो क्षण अद्भुत था,
जब हँसी और आँसू
एक साथ आए थे
चेहरे पर मेरे!
सुकून दर्शाने को!
तुम्हें पा जाने का;
तुम्हें सीने से
लगाने का!
कभी झल्ला दूँ
तुमपर,
या लड़ लूँ
किसी दिन तुमसे,
और फिर मनाऊँ
आप ही तुमको,
या सहम जाऊँ
या हँस दूँ
तुम्हारी डाँट पर,
तो हैरत मत करना।
कि यह भी सुकून है!
कि हक़ है मेरा
तुम पर,
तुम्हारे प्यार पर!
यह हक़ मेरा
बरकरार रखना।
सुकून है
तुम्हारे प्यार में।
जैसा है आज
वैसा ही कल
अपना प्यार रखना!
-आरती मानेकर

पहले मिलन की बात

तेज-तेज बढ़े थे कदम
और साँसें यकायक बढ़ रही।
बैचैन हो चला था मन
और अधरों पर थी खुशी।
पहले मिलन की बात थी,
कि आँखें ढूँढ़ती रहीं;
साक्षात देख सजन को
थी सजनी मौन रही।
अधरों से बोला न गया
बातें किंतु न चुप रहीं।
खोए थे ऐसे वे कि
आँखें उनकी बोलती रहीं।
प्रेमालिंगन हुआ था ऐसा
बाहें थीं, फूलमाल नहीं।
कितने सुंदर लगते थे वे,
यथा उर का आकार यही।
मस्तक पर कोमल चुम्बन
यह प्रेम से पृथक् था नहीं।
समय रुका हुआ लगता था,
निशा को कदाचित जल्दी नहीं।
एक थे उनके तन-मन सारे,
दो हाथों की मुट्ठी एक बनी रही।
अनामिका में अंगुठी तब से
प्रेमाभिव्यक्ति का प्रमाण बनी रही।
श्रृंगार किया सजन ने नख-शिख का,
थी सजनी शर्म से लाल हो रही।
पायल टूटी फिर उतावलेपन में,
किन्तु उसकी झंकार बनी रही।
भास्कर सम तेज़ था उनका,
‘आरती’ वो भी जलती रही।
उष्णता, शीतल रात में इतनी;
थी प्रेम का उत्पाद वही!
प्रेमोन्माद में थे वे दोनों,
आँखें सारी रात जागती रही।
खूब चाँदनी बिखरी धरा पर,
वो इस मिलन को निहारती रही।
कितनी खुशी, कई सारी बातें,
अश्रुलडीं भी न निःस्पर्श रही।
स्मृति इन अमूल्य क्षणों की,
थी तस्वीरों में कहीं-कहीं।
वियोग के क्षण आँखें न मिलींं;
खूब रोईंं, निर्झर बनी रहींं।
प्रेम के इस अपरिचित शहर में
प्रेमपूर्ण उर धड़के थे कहीं!
चिरायु हो वो प्रेमी युगल, कि
शुभकामना जग की बनी रही।
हो वर्णन इस प्रेम मिलन का,
मेरे शब्दों में वो बात नहीं!
-आरती मानेकर