I lost an year…

In these 19 years,

I got a family, caring

I got teachers, making

I got friends, helping

I met strangers, living.

But, what I lost?

I lost an year….
In these 19 years,

My knowledge increased,

Increased my friend circle,

Cherished my dreams,

I got the fame.

But, what I lost?

I lost an year….
In these 19 years,

I faced many problems,

I solved many puzzles,

I played and won games,

I lived many struggles.

But, what I lost?

I lost an year….
On this 19th B’day,

Thousands of wishes,

Hundreds of surprises,

Numbers of calls,

And a day beautiful.

But, what I lost?

I lost an year….
Every year,

I grow up one year,

Get happiness,

Get memories.

But, what I lost?

I lost an year….

An year of my life…


Arti Manekar

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दोहे

नमस्कार मित्रों! 

इस बार रचना को एक नया आयाम दिया है।

कविता के शाब्दिक अनुशासन को छंद कहते हैं।

इस बात का ध्यान रखते हुए आज पहली बार शब्दों को छंद में पिरोने का प्रयत्न किया है। आशा है आप सभी को पसंद आए। प्रशंसा और आलोचना दोनों ही सादर आमन्त्रित हैं।😊

लिखती रही हूँ मुक्तक, लिखूँ छंद इस बार।
करती हूँ आरम्भ मैं, अवश्य रखें विचार।।1।।

दिन दीन के बीत रहें, निशदिन इसी विचार।

आम-आम के होंगे कि, बढ़ेगी ये कतार।।2।।

गुण-अवगुण सब जानकर, मन से ले अपनाय।

गलती पर जो डाँट दे, सच्चा मित्र कहलाय।।3।।

अंतर्जाल के युग में, खोया तू इस प्रकार।

सूध-बूध तो खोय दी, क्यों भूला संसार।।4।।

धन-दौलत अरु नाम का, तज दे तू अभिमान।

मन्दिर अरु शमशान में, राजा-रंक समान।।5।।

समय पड़े ते तज दे, जो तरकश के तीर।

धर्मरक्षा कर्म जिसका, सो राजा अरु वीर।।6।।

अवनि-अग्नि-अम्बर-अनिल, जल; तत्व ये अमूल्य।

संवर्धन का भान हो, प्रकृति जननी तुल्य।।7।।

मीरा नहीं; किन्तु अमर, कृष्णभक्ति के गीत।

अंत बाद भी संग हो, वही निस्वार्थ प्रीत।।8।।

नीति की अनेक बातें, कहते चारों वेद।

किन्तु मानव भूल गया, भले-बुरे का भेद।।9।।

प्रातः उठ पूर्ण मन से, नित्य-नियम कर ध्यान।

ईश स्मरण वर्धित करे, काम-नाम अरु ज्ञान।।10।।
-आरती मानेकर

let’s help him to grow up….

Hi guys, good noon. Hope you all are doing great..

This is said… 

Helping hands are always better than praying lips…

So let’s help today…

All we have hidden talents. But sometimes our talent doesn’t get the appear to people…. And hence it remains unseen…
The same is happening to my friend..

He’s also a  blogger, and really a very good writer..

So I want you guys to visit his blog n follow must…

iamthatrandomguyblog.wordpress.com

Have a nice day…

Keep writing…😇

My friend, let’s win the world again… (Resurrect….)

Listen, my friend..

Yes, I’m talking to you..

But why are you calm?

I can see your eyes wet,

I can hear your words unsaid,

And feel your heart upset.

I know you are hurt,

Frustrated and disappointed.

And afraid of failure.

But listen..

Failure is just a state,

Before a grand success.

And the pain and sorrow

You are talking about,

Are not really permanent.

Like anything else here.

Then why you sit idol?

And why you always cry? 

Can’t you smile

To forget your pain?

Can’t you trust yourself

To win the world again?

I’m not here to listen your sad talks.

I just want you to smile and laugh.

I can dance with you

On the rhythm of life.

I can sing with you
And chant the melodious pray.

And I can walk with you
Until the life ends.

-Arti Manekar

हम हिन्दी जानते हैं..

हां, हम भारतीय हिन्दी को माँ मानते हैं,

गर्व है हमें कि हम हिन्दी जानते हैं।
आज राष्ट्रभाषा के इसी विश्वास पर,
आओ एक दृष्टि धरे, हिन्दी के इतिहास पर।
कहाँ गई कबीर की अमृत वाणी,
और तुलसी की वो राम कहानी।
वो अलंकार- रूपक या भाँतिमान,
छंद रोला-दोहा के छप्पय समान।
वो कृष्ण-राधा प्रेम का रस श्रृंगार,
रौद्र को व्यक्त करते नेत्रों में अंगार।
दस रसों की पद्य में जिजीविषाएँ,
और गद्य की लिखित विविध विधाएँ।
न रही लेखनी आलोचकों से निर्विवाद,
प्रकृति प्रेम से पूरित ‘प्रसाद’ का छायावाद।
कहाँ गए वो मुंशी जी-‘उपन्यास सम्राट’,
और हिन्दी साहित्य का इतिहास विराट।
हिन्दी के स्वर्णिम इतिहास से हम दूर हैं,
अल्पज्ञानी हैं हम और मद में चूर हैं।
आधुनिकता के विष से ऐसे संक्रमित हैं,
हम हिन्दी जानते हैं, इस बात से भ्रमित हैं।

-आरती मानेकर
सभी हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं…!😊

आवाज…

निःशब्द बैठी थी मैं,

एकांतवास में।

उर भी तो शांत था,

शब्दों की आस में।।
पवन बह रही शांति से,

लहरें सागर की शांत थी।

चहुओर थी एकांतता अरु

स्तब्धता व्याप्त नितांत भी।।
इसी क्षण आवाज आई,

उसी कदम्ब के तरु पर से।

कोयल आई थी मिलने को,

कुसुम, पात अरु हर से।।
उसके गायन की मधुर ध्वनि

पसरी घर के हर कोने में।

वो बोली मुझसे अब तू हँस,

आनंद कहाँ है रोने में!
कर लिया उसने यूँ विवश मुझे,

संग में उसी के मैं गा पड़ी।

आल्हादित अरु आकर्षित होकर,

थी समक्ष जिंदगी आ खड़ी।।

-आरती मानेकर

माँ

It’s a pleasure to read our own old poems…

I was reading my poems today and here I want to share my first poem….which I wrote 6 years ago…on 21st January 2010..

Hope you guys will like it…

माँ, एक माँ

जिसने मुझे जन्म दिया और इतना बड़ा किया।

माँ, एक भगवान

जो बिना मांगे मुझे सब कुछ दे देती है।

माँ, एक अंतर्यामी

जो बिना बताएं मेरे मन की बात जान लेती है।

माँ, एक सूरज

जो रोज मुझे एक नया सवेरा दिखाती है।

माँ, एक कल्पवृक्ष

जो धूप में भी मुझे अपने आँचल की छाँव में बिठाती है।

माँ, एक शिक्षक

जिसकी डाँट में भी मेरे लिए प्यार छुपा होता है।

माँ, एक मार्गदर्शक

जो मुझे हर पल एक सही राह ही दिखाती है।

माँ, एक दीपक

जो पूरे घर से अंधेरा हटाकर घर को प्रकाशित करती है।

माँ, एक गृहिणी
जो घर को इतनी अच्छी तरह से संभालती है।

माँ, एक बहू
जो घर में सबका ध्यान रखती है।

माँ, एक पत्नी
जो पति की अर्धांगिणी होती है।

माँ, एक पड़ोसन
जो मोहल्ले में सबके काम आती है।

माँ, एक नारी
जो नारी शक्ति का कभी अपमान नहीं होने देती।

माँ, एक जननी
मेरी सफलता में जिसका पूरा हाथ है।

माँ, एक बच्ची

जो मेरे साथ बच्चों की तरह खेलती है।

माँ, एक सहेली
जो हर सुख-दुःख, सफलता-विफलता और जिंदगी के हर कदम में मेरा साथ देती है।

-आरती मानेकर