लिख नहीं पाती हूँ मैं!

कविताएँ…
अब लिख नहीं पाती हूँ मैं!
पहले की तरह
रोज़ ही।
विचार आते हैं
और एकाएक
शब्द खो जाते हैं
तब ही…!

रोटी एक पड़ी होती है
तवे पर,
एक चकते पर।
ऐसे ही कोई विचार
आता है मन में,
उस बेलती रोटी के समान ही
बड़ा होता जाता है
और तवे पर की रोटी की,
जैसे फुलकर भाँप निकल जाती है,
वैसे ही विचारों को भी
जाना होता है
मन से,
हवा होकर…!

घुलने लगता है
पानी में अपमार्जक
और झाग देने के साथ ही
कपड़ों को निखार देता है।
वैसे ही,
निखरता जाता है विचार
कल्पनाशक्ति के अपमार्जक से।
और अंत में
जैसे ही कपड़ों को निचोड़कर,
झटकने से
पानी की बूँदें निकल जाती हैं
कपड़ों से,
और बची-खुची बूँदों को
सोख लेती है धूप।
उन बूँदों के साथ ही
उड़ जाता है
विचार!
और सूखने लगता है मन!

ऐसा नहीं कि
लिखना नहीं चाहती हूँ मैं!
लालायित और कुछ परेशान
देखा है मैंने
स्वयं को,
जब कभी लिख नहीं पाई हूँ।
किन्तु अब,
कविता में लिखें जाने वाले
भावों के अतिरिक्त भी
उठने लगें हैं मन में
विचार!
विचार कि-
क्या बनाया जाए
आज भोजन में?
कहीं कचरा तो नहीं रह गया
सफ़ाई के बाद भी आंगन में?
कहीं सब्जी तीख़ी ना हो जाए!
कि सूखकर कपड़े
गिर ना जाए!
कि मेहमान आते होंगे,
घर सँवार लूँ।
कि जाकर माँ के पास बैठूँ,
ज़िन्दगी निहार लूँ।

कल को घर होगा
मेरा भी,
जिसकी फ़िक़्र
मुझ ही को करनी है।
कभी-कभी फिर
सूखी कलम में
फुर्सत निकाल कर
स्याही भी भरनी है।
कागज़ और कलम से अधिक
अब चकते-बेलन से रिश्ता है।
अब तारीफ़ों की भूख कम,
जिम्मेदारी निभाने की लालसा है।
-आरती मानेकर

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प्रश्न अनुत्तरित…

कल परीक्षा देते समय
मन नहीं मेरा स्थिर था।
विस्मृत थे कुछ प्रश्न,
स्मृति में न कोई उत्तर था।
लेखनी ठिठकी-सी किन्तु,
अनुत्तीर्ण होने का भय न था।
मस्तिष्क साथ छोड़ देता,
ऐसा तो वो विषय भी न था।
उत्तर किस प्रश्न का लिखा जाए?
मन इसी ऊहापोह में था।
प्रश्न सरल ही थे, किन्तु मन
कौन जाने किस टोह में था!
अंततः किया एक भरसक प्रयास
और किया लेखनी को त्वरित!
उत्तीर्ण होने की मंशा से मैंने
नहीं छोड़ा कोई प्रश्न अनुत्तरित!

वापस आकर के विचार किया-
पाया, जिंदगी भी एक परीक्षा है।
ये प्रतिपल ही करती है प्रश्न,
हर उत्तर की इसे प्रतीक्षा है।
कठिन लगते हैं कभी प्रश्न इसके,
उत्तर देने में कभी हिचकिचाहट।
चिंतित हो जाता है फिर मन,
व्यवहार में होती है बौखलाहट।
उत्तर तो सबके ही पास है,
क्यों न जिंदगी से बात की जाए?
सफलता-विफलता को बगल में रख,
क्यों न लिखने की शुरुआत की जाए?
कई समस्याएँ हल हो जाएँगी,
यदि हम उत्तर दें हृदय से पारित!
इसके अर्थों को संज्ञान में लें,
क्यों ही छोड़े इसके प्रश्न अनुत्तरित?
-आरती मानेकर

फ़नकार का जवाब

मुझे मिटा दिया, ये सोचकर, तुम जी रहे होंगे बड़ी राहत में,
लेकिन फ़नकार मरते नहीं फ़ना हो जाते हैं, फ़न की चाहत में!
तुम मुझे मार सकते हो, लेकिन मेरे जज़्बात का क्या?
मेरी कलम तोड़ दो, लेकिन उसके रोशनाई से निस्बत का क्या?
कागज़ तुम जो फाड़ दो सारे, तो फ़लक ज़मीन हो मेरे लिए,
जो मैं लिख दूँ फिर कोई गज़ल, तुम इतने हैरान हो किस लिए?

मैं अभी मर नहीं सकता कि नज़्में जावेद लिखना बाक़ी हैं,
तेरी हार और मेरी फ़तह की हसीं नावेद लिखना बाक़ी है।
दहर के दिल पर इश्क़ के अल्फ़ाज़ लिखना बाक़ी हैं,
आसमां से ऊपर उठने वाली परवाज़ लिखना बाक़ी है।बदल दूँ मैं ज़माने की चाल को, ऐसे मेरे ख़यालात लिखना बाक़ी हैं,
चर्चें तुम मेरे नाम के सुनो, उस वक़्त के तुम्हारे हालात लिखना बाक़ी हैं!
नौनिहालों को सुना सकूँ, वो किस्सा लिखना बाक़ी है,
मेरे मुल्क के फ़रोग़ में मेरा हिस्सा लिखना बाक़ी है!

-आरती मानेकर

The poem may seem weird to you, as it is the sequence to my previous poem. To understand this one, you must read my previous poem. Here is the link- कलाकार से प्रतिशोध .

Thank you…

आधा-आधा

आधा-आधा दिन बीता है,

आधी-आधी रात है बाकी,

पहले संध्याएँ सजा करतीं थीं;

अब आधे ही मित हैं बाकी!
आधी थी, जब भूख लगी थी

आधी ही माँ ने रोटी दी थी।

स्वास्थ्य पतन भी आधा हुआ है,

आधा ही अब उदर है बाकी!
आधी बढ़ी, फिर ज्ञान-पिपासा;

मुझमें बढ़ी फिर आधी-आधी;

समय बढ़ा, गुरु दूर हुए,

रही ज्ञान की प्राप्ति बाकी!
आधी उम्र में लगन लगी है,

प्रेम की अभिव्यक्ति है बाकी।

कल्पनाएँ तो खूब हुईं हैं,

प्रिय से मिलन आधा है बाकी!
आधा ही जीवन, आधी ही मैं

राह चलना फिर भी है आधी।

प्रयास कभी रहे नहीं आधे,

मंजिल मिलना केवल है बाकी!
दो दशक बीते, अलभ्य रहा सब

आधे-आधे अवसर हैं बाकी।

किंतु स्वप्न प्राप्त करने को

अर्धशति अब भी है बाकी!
कभी शब्दों का सैलाब उमड़ा था,

रहा विचारों का कहीं युद्ध बाकी।

कोई कलम चुरा ले गया है मुझसे;

आधे ही मुझमें भी भाव हैं बाकी!
-आरती मानेकर

तुम्हारी प्रतिक्षा में!!!

अलमारी के ऊपरी खाने में रखी

वो सुनहरी जिल्द वाली

तुम्हारी और मेरी बातों की

किताब कहीं गुम हो चुकी है।

शायद दुनियादारी की अगणित किताबों के बीच

दब गई हो!

लुका – छुपी के खेल में

दरवाजे के परदे के पीछे

तुम छिपते थे।

वहां अब केवल तुम्हारा अहसास

रज बनकर बाकी है।

कमरे की दीवार पर लगी

हमारी तस्वीरों की चौखटें

कुछ टूट गईं हैं और

गिरने लगी हैं तस्वीरें

कीलों के निकल जाने से!!

आंगन में लगे उस पेड़ के झूले की

रस्सियां भी झूलस गईं हैं…

अब नहीं सहती वो भार मेरा;

जो सह लेती थीं,

तुमको और मुझको

एक समेत!!!

और मेरा बचपन

अंगड़ाइयां नहीं लेता अब

मां की गोद में!

जो तुमसे लड़ने पर

सो जाया करता था।

चीजें बदल तो गईं हैं

मित्र! तुम्हारे जाने से…

तुम्हारा शहर विस्तृत हो चला

और सिमटता गया 

मेरे गांव का दायरा

तुम्हारी प्रतिक्षा में!!!

-आरती मानेकर

निर्माणों के पावनयुग में और भी दूँ…

निर्माणों का पावनयुग है आया,

चाहती हूँ निर्माणों के पावनयुग में और भी दूँ!

शस्त्र भी दे दूँ, शास्त्र भी दे दूँ,

इस पावनयुग के निर्माण में, मैं अपना ज्ञान भी दूँ।
सपनें रंगीन सारे दे दूँ,

अरमानों के पंख फैलाकर,

मैं जिस आकाश में उड़ा करती हूँ,

चाहती हूँ वो आसमान भी मैं दे दूँ।
रक्त का वो प्रत्येक क़तरा,

खून – लहू – रक्त भी दे दूँ।

श्वास; मेरे प्राण का आधार है जो,

वो श्वास अंतिम मेरी, पावनयुग में दे दूँ।
तन – मन – धन, सर्वस्व दे दूँ।

मैं अपना बलिदान भी दे दूँ।

जीवन का प्रत्येक अमूल्य क्षण,

दिन – सप्ताह – महीने -साल,

समय पूरा मैं अपना दे दूँ।

निर्माणों के पावनयुग में और भी दूँ!

पावनयुग के इस निर्माण में,

नींव रखूं मैं अपने सपनों की।

जिंदगी के कठोर संघर्षों को ईंटें बनाकर,

इन ईंटों से मज़बूत दीवार बना दूँ।

संसार के आशीर्वाद वाली

छत भी ऊपर बना दूँ।
जब सपने होंगे मेरे पूरे,

मानो, जैसे निर्माण हुआ पूरा पावनयुग का।

अब उन रंगों से, जो मेरी जिंदगी है,

मैं पावनयुग के निर्माण का सपना रंग दूँ।
हो गया अब पूरा निर्माण पावनयुग का,

फिर भी मैं चाहती हूँ-

“निर्माणों के पावनयुग में और भी दूँ!”

-आरती मानेकर

खेल

चलो मित्रों!

एक खेलें खेल!

ना मैं जीतूं,

ना तुम हारो,

बस दिल जीते

और हारे दिन।

हम गीतों की रेल बनाएं,

अंत अक्षर से

गीत अगला गाएं,

कुछ गीत पुराने

तुम गाना,

कुछ नए तराने

मैं सुनाऊँ।

प्रभु प्रार्थना से प्रारम्भ,

भक्ति में डूबे सब जन,

अश्रु बहेंगे;

एक गीत गुनना,

होगी हंसी – ठिठौली,

दूजे गीत के संग,

तीजे में तुम

हमें नाच दिखाना,

चौथे में थिरकेंगे

सबके कदम।

गाओ क्रमवार,

लगातार चढ़ने दो

खेल का रंग,

अंत ना करना

चाहे रात बढ़ेगी,

हम खेलें खेल

चाहे दिन हो मलंग।

यह खेल दिल मिलाएं,

नई यादें बनाएं,

कभी किसी को हंसाएं,

कभी किसी को रुलाएं।

चलो मित्रों!

एक खेलें खेल!

कोई जो एक गीत गाएं,

भूले जो वो तो,

सब संग में सुर मिलाएं,

यह दिलों से बैर मिटाएं।

-आरती मानेकर