Book Review: Jim Morgan And The Seven Sins

Author: Bharat Madan

Genre: Thriller

Description:

 A quest to identify seven deadly sins 

A mystery behind seven keys that were passed to seven men

A deadly race against time to seek atonement

On the outskirts of New York City, Jim Morgan, an international bestselling author learns through God that he had committed seven sins in his previous life. Clues lie in the six novels he has written, that would lead him to the mystery. But the novels won’t reveal everything to him. With seven days on hand, he must walk in the direction that faith leads him in, to reach the lost chamber of Seven Planets. Unless Morgan understands the secret behind his past life and the sins he committed, his chance to live will be lost forever.


About The Author:

 Bharat Madan is an author, motivational speaker and a personality developer. He has been a meritorious student through his time at college and holds an MBA from Amity University. He received the prestigious Shree Baljit Shastri Award and Best All Round Student Award, the highest award at his university.

 His journey as a writer began after he finished his education. His first piece of fiction, the story of a college boy over three years, was set aside in favor of his decision to make a debut with a more mature and conceptually unique novel.

As a motivational speaker, he has inspired thousands of students in reputed schools in Jaipur. Through his writing and speaking skills, Bharat endeavors to add value to the lives of students and make their personalities forces to be reckoned with.

After pressing demands from his listeners, Bharat started a YouTube Channel called “Bharath Madan” to share his ideas through the digital platform.

He derives inspiration from his mother who raised him single-handedly after he lost his father at a young age.

My View: I was already excited to read this book as I had heard a lot about it.I seriously don’t have words to describe how the book goes, but still I’m trying.

Characters of the novel are sketched perfectly with the magical word selection. Language is, no doubt excellent, to make you feel that all the scenes are happening in front of your eyes. The formation of the story at the beginning is just amazing. It was a direct start to the main story as he has to show only 7 days of his life… And so the author didn’t give any prologue.

The best part of the story is that the clue for each sin is in the box written by Jim. It was actually mysterious, how he goes to his past life using the time portal. 

In middle I was a lil confused about how the story going as everything in the story was happening too certain. A logical flaw was there, as many characters of the book had a good knowledge of Hinduism, thought it wasn’t an Indian background story. The suspance of his last birth remains Till the last. The book made me curious to read Indian spiritual books as I haven’t read any of them. 

This is a book which gets you hooked on it.

This is now in my favorite book…

Star Rating:  4.5/5

Order your book here.. 

Jim Morgan and The Seven Sins .


Stay tuned…

-Arti Manekar

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पुस्तक समीक्षा (Book Review)- रूबरू

नमस्कार!

आज कोई अंग्रेजी किताब नहीं, वरन् हिंदी काव्य संग्रह “रूबरू” को आपसे रूबरू कराने आई हूँ। कवियत्री प्रियंका बंसल जी की रचनाओं का संग्रह है “रूबरू”!

विवरण: जीवन से रूबरू कराने वाला काव्य संंग्रह…

कवि परिचय: प्रियंका बंसल ने 16 वर्ष की उम्र से लेखन शुरू किया और तब से उनकी कलम रूकी नहीं है। हर चीज को बारीकी से देखने और समझने वाली यह लेखिका, ज्यादातर सामाजिक और पारिवारिक मुद्दों पर लिखती है।

 काफी सारी कथा-कहानियां अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं और वे वेब पत्रिकाओं और सांझा लेखन संग्रह का हिस्सा भी है।इसके साथ ही वह बुक रिव्युअर भी है। लेखन के अलावा उन्हें रचनात्मक कार्य करना बेहद पसंद है।

प्रियंका ने कंप्यूटर में मास्टर्स किया है, कत्थक नृत्य में पारंगत है और राज्यस्तरीय बास्केटबॉल खिलाड़ी रह चुकी है। हस्ताक्षर पढ़कर वह किसी भी व्यक्ति के बारे में काफी कुछ बताने में सक्षम है।

 यह उनकी तिसरी किताब है। इससे पहले एक हिंदी में कविताओं की और दूसरी अंग्रेजी में लघु कथाओं की किताबें आ चुकी हैं।

संपर्क कड़ी: priyankaagraw@gmail.com

 मेरा मत: सबसे पहले बात करते हैं पुस्तक के शीर्षक की, तो मैंने पाया कि “रूबरू” यह शीर्षक सौ फिसदी ठीक है। पुस्तक में संग्रहित कविताएं जीवन से रूबरू करवा देने वाली हैं। 73 कविताएं, जीवन के 73 तरीकें बताती हैं।

नई कविताओं का दौर चल रहा है और यहां मुक्तक काव्य की प्राथमिकता है। इसी क्रम में प्रियंका जी ने भी मुक्तक काव्य ही लिखा है। कविताओं का मुख्य रस शांत है। हर कविता अपने आप में कुछ विशेषता लिये है। भाषा सरल है, जिसे समझने के लिए पाठकों को विशेष मेहनत नहीं करनी होगी। शब्द चयन भी काफी उम्दा है। कविताओं के अर्थ तक आप जाते हैं, तो कविता और कवियित्री, दोनों ही की परिपक्वता आपको दिखाई देगी।

प्रियंका जी ने कविता के शीर्षकों के अनुरूप अपने आप को हर संभव स्थान पर रखकर काव्य रचना की है और इसमें वे काफी हद तक सफल है।

कुछ कविताओं को मैं भी स्वयं के जीवन के करीब पाती हूँ, तो कुछ आपके अंतर को जरूर छू लेंगी। जीवन के सत्यों को उद्घाटित करने वाली कविताएं हैं, जिनके बारे में हम यों तो नहीं सोचते, लेकिन इन्हें पढ़ने के बाद जरूर सोचेंगे।

कुछ कविताओं के शीर्षक मुझे कमजोर-से जान पड़े, जो पाठक को कविता की पूर्व कल्पना नहीं करने देते।कई जगहों पर कुछ कमियां-खामियां भी हैं जो शायद एडिटिंग की भूल हैं , अगले संस्करण में इनके सुधार की आशा है।

कविता ह्रदय की वस्तु है। ह्रदय को स्वस्थ रखने के क्रम में यह किताब मददगार साबित होगी।

अपनी प्रति आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं- Roobroo.

 स्टार रेटिंग: 4/5

-आरती मानेकर

प्यार वाला किस्सा

खूब व्यस्त जान पड़ते हो!

कोई बात नहीं!

फुरसत जब मिलेगी,

तो याद कर लेना।

मैं दौड़ी चली आऊंगी,

एक संदेश लिख देना।
कुछ शिकायतें करनी हैं तुमसे,

ताने भी मैं सौ-सौ दूंगी,

फेहरिस्त बना रखी है,

विस्तृत ब्यौरा भी मैं दूंगी।
चुप्पी क्यों साधी है तुमने?

क्या कोई गलती मुझसे हुई थी?

मुझे तो जिंदगी-सी जान पड़ी थी,

उस दिन जो हमारी बातें हुईं थीं। 
तबसे दिन जरा बदले-से हैं,

मेरे नाम की रट सुनाई नहीं देती!

दिन-दिनचर्या में बीत है जाता,

मैं ही जानूँ, मेरी रात कैसे बीती!
मन कल्पनाओं से भ्रमित हो रहा था,

बुनने लगा था क्रोध का ताना-बाना,

एकांत में रोना अच्छा लग रहा था,

भाता नहीं था कोई अन्न का दाना।
मैं पहले रोती तो नहीं थी,

प्यार में भी तो नहीं थी पहले!

मैं हठी, थोड़ी पगली-सी हूँ,

तुम बनो समझदार, अच्छे-भले।
क्यों तुमको खलता है ना

मेरा गैरों से बातें करना?

मुझको भी बुरा लगता होगा,

मैं भी तो मन रखती हूं ना!
माना कि यह व्यस्तता तुम्हारी

अपने बेहतर कल के लिए है!

किंतु उन लम्हों को सजाऊँ कैसे,

जिनमें हम-तुम नहीं मिले हैं?
आओ ना, थोड़ा समय पाकर,

अब इतना भी मत सताओ,

डांटो थोड़ा, थोड़ा प्यार भी दो,

मुझ पर प्यार का अपने हक़ जताओ!
मैं तुम्हारी जिन्दगी की कहानी का 

प्यार वाला किस्सा हूँ,

हां, दूर जरूर हूँ तुमसे मैं,

लेकिन मैं भी तो तुम्हारा हिस्सा हूँ…!
-आरती मानेकर

मतदान: लोकतंत्र का त्यौहार

विश्व के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश भारत में चुनाव का दौर शुरू है। इसी के अंतर्गत मेरे शहर सौंसर (मध्यप्रदेश) में भी आज नगर पालिका अध्यक्ष व पार्षद पद के चुनाव है। अब जैसा कि मैंने शीर्षक में ही लिखा है “मतदान:लोकतंत्र का त्यौहार”, तो देखते हैं मेरे शहर में यह त्यौहार कैसे मनाया जा रहा है।

चुनाव का माहौल तो पिछले एक-डेढ़ महीने से ही है। 15 वार्डों से बने मेरे शहर में करीब 25000 मतदाता हैं। प्रत्याशी नामांकन पत्र भरते हैं, कुछ को सीट मिली, तो किसी को नामांकन वापस लेने को कहा गया, किंतु यह राजनीति है, यहां कौन, किसकी मानता है। अब देखिए, मेरे वार्ड में कुल 5 प्रत्याशी खड़े हुए हैं, जिनमें भाजपा, कांग्रेस के अतिरिक्त अन्य निर्दलीय प्रत्याशी भी है। अब जब बारी प्रचार की आती है, तो मैंने पाया कि उनमें से कुछ को तो मैंने कभी देखा भी नहीं है। बारी-बारी से बार-बार हर प्रत्याशी ने घर में दर्शन दिए। किसी ने बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया, तो किसी ने हाथ जोड़कर विनती की। ढोल-नगाड़ों के साथ हर प्रत्याशी ने अपना खूब प्रचार किया। कुछ दलों के जुलूसों में बच्चे भी थें, जिनको चुनाव का अर्थ भी पता नहीं, फिर भी नारेबाज़ी के साथ प्रचार कर रहे। फलां महोदय ने तो प्रचार की चरम सीमा पा ली है। कभी गाड़ी में बैठकर प्रचार किया, तो कभी दूल्हे जैसे सजकर घोड़े पर पूरा शहर घूम रहे। हद तो तब हुई, जब किन्नरों को साथ लिए सड़कों पर नृत्य करने लगे। खैर महोदय जी के जीतने के संबंध में कुछ कहा नहीं जा सकता, किंतु इन्होंने लोगों को हंसाया खूब है।

शहर में टक्कर कांटे की है, क्योंकि जातिवाद की परंपरा आज भी लोगों में चली आ रही है और यहां हर जाति के मतदाता हैं और लगभग हर जाति के उम्मीदवार भी।

उनकी नजरें युवा मतदाताओं पर खासी टिकी है। लेकिन शायद मैं अवयस्क लगती हूँ, तभी उन लोगों को बताना पड़ता है कि इस वर्ष मेरा भी मत है। पिछले मतदान से ही उत्साहित थी मैं इस दिन के लिए।

मैंने तो खूब लुप्त उठाया इस त्यौहार का। लोग जब घर आते और कहते कि, बेटा ध्यान रखना, तब हम भी हंसकर कहते कि, अभी तो हम ध्यान दे रहे हैं, जीतने के बाद कभी-कभार आप भी हम पर.ध्यान देते रहना। कई लोग यह भी पूछते हैं कि, बेटा किसे मत दोगी या दिया है, तब मेरा एक ही उत्तर होता है- जितने वाले को! क्योंकि अगर मेरा मत दिया इंसान नहीं भी जीतता है, तो भी जीतने वाले की सफलता में मेरा मत है, क्योंकि हारने वाले को मैंने मत दिया है। और अगर मेरा मत दिया इंसान जीतता है, तो फिर क्या कहने!

कई लोगों को मैंने देखा, सुबह एक दल के प्रचार में थें, तो शाम को दूसरे दल के जुलूस में। अब यहां कहने वाली बात नहीं, पाठक स्वयं समझदार हैं, कि जब दोनों तरफ से मतलब पूरा होता हो, तो ईमान डगमगा जाए तो भी कोई जिद्दत नहीं। खैर प्रचार कितनों का भी कर लो, मत तो केवल एक को ही देना है।

लोग शायद मतदान को केवल प्रत्याशियों के मतलब की चीज समझते हैं, देश के प्रति स्वयं का कर्तव्य नहीं! तभी तो कुछ लोगों ने प्रत्याशियों से मतदान केंद्र तक जाने का पेट्रोल भी मांग लिया।
एक फायदा मुझे भी हुआ है मतदान से, मेरे विद्यार्थियों को पिछले कुछ दिनों से इसी विषय के बारे में पढ़ा रही थी, संयोग से चुनाव की वजह से मुझे उन्हें समझाने में पर्याप्त उदाहरण मिल गए। सबसे बड़ा दुःख मेरी बहन को हुआ है। आचार संहिता के कारण राष्ट्रीय त्यौहार (स्वतंत्रता दिवस) के उपलक्ष्य में जो कार्यक्रम विद्यालयों में होते हैं,  वो स्थगित कर दिए गए हैं, अन्यथा वह तो पूरी तैयारियों में थी।

चलो एक महीना बित गया, ढोल-नगाड़ों की आवाज के साथ और कल रात को आचार संहिता के साथ-साथ धारा 144 भी शहर में लागू हुई। लेकिन नियमों को तोड़ने वाले लोग कहां मानते हैं, 5 से ज्यादा लोगों के गुट तो कई जगह देखने मिले हैं। कुछ लोग किसी दल के बारे में भ्रामक अफवाह फैला रहे हैं। शहर में चर्चा का एकमात्र विषय है यह चुनाव। यहां तक कि व्हाट्सएप समूहों में भी बस यही चर्चा है। एक विशेष बात यह है कि जो कभी खास दोस्त थें, आज वे दोनों एक-दूसरे के विरोध में चुनाव लड़ रहे हैं।

आज सुबह मेरी नींद रोज की अपेक्षा जल्दी खुली, उत्साह ही वजह है इसकी। नहा-धोकर, तैयार होकर, गाड़ी लेकर मैं निकल पड़ी सुबह 7:30 बजे, घर से मतदान केंद्र की ओर। भीड़ ज्यादा नहीं थी वहां इतने सुबह, तो जल्दी ही मेरी बारी भी आ गई। वहां बैठे चुनाव आयोग के लोगों ने मेरा मतदाता पत्र देखा, उनके पास रखी सूचियों में मेरा क्रमांक जांचा, मेरे हस्ताक्षर लिए, तर्जनी पर स्याही लगाई और आगे बढ़कर ई.वी.एम. मशीन के द्वारा मैंने अपने मत दिए।ह्रदय गति थोड़ी बढ़ी हुई थी,  उत्साह अब गर्व में बदल चुका था और खुशी भी थी। आखिर अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए मैंने देश के प्रति अपने पहले कर्तव्य को निभाया। 19वेंं क्रमांक की मतदाता थी मैं आज।

 सुबह से लोग सबको मतदान केंद्र तक पहुंचाने में लगे हुए हैं, गाड़ियां भी लगी है, सबके चेहरों और कपड़ों में भी आज विशेष चमक है, आखिर त्यौहार की खुशी है। शाम तक यही दौर चलेगा। 16 अगस्त को परिणाम भी घोषित होगा। तब कोई लेख नहीं लिखूंगी, खुशियां मनाई जाएगी उस दिन, प्रजातंत्र की जीत की।
-आरती मानेकर