Happy New Year

Happy New Year…

​A very very happy new year to all of you.

On this new year, I’m here with 4 poems, which have been written by me on last 4 New Years ..

So here I go…!


आह्वान (New year 2017)


जब मन में तेरे द्वंद्व चले

संसार दण्ड – सा जान पडे़

आत्म को संभाल कर,

ईश का आशीष ले।

चिंताओं से मुक्त हो,

संज्ञाओं से विरक्त हो,

मस्तिष्क तेरा रिक्त हो,

हो क्रांति को तैयार तू!

सुन जीवन की पुकार तू।
छल के अरण्य में

बनावट के भ्रम में

टूटकर बिखर रही

रोती हुई मानवता,

है तुझको पुकारती

पुकारती मां भारती

और प्रक्रृति पुकारती

हमको तू संवार दे!

हे मित्र! स्वत्व वार दे।
पाप होता देखकर

तू मौन अपना त्यजना,

किन्तु अपनों की भुल पर

शांत चित्त रखना।

बन ना हलाहल विष तू,

असहाय का प्रतिकष तू,

कर क्षमा इस वर्ष तू,

तू क्रोध – रग काट दे!

मुक्ता – सी हंसी बांट दे।
‘खुशी’ को लक्ष्य ठानकर

कर परिश्रम अथक,

एक कर दे अहिर्निश

और अस्तित्व तेरा सार्थक।

प्रतिक्षा करे जीत तेरी,

दे परीक्षा प्रीत तेरी,

चलती रहे ये रीत तेरी,

शुभ का शंखनाद कर!

तू द्वंद्व निर्विवाद कर।

-आरती मानेकर

बदलाव (New year 2016)


बदल रहे हैं साल लगातार

फिर क्यों बदलती नहीं

ये सोच! इंसान तेरी?

वही कुंठित संकुचित – सी सोच

रोक लेती है तुझे और

रोकती है तेरे देश को

प्रगति पथ पर चलने से।
सीमाएं तू तोड़ रहा नित

नए ज्ञान की, फिर क्यों

तेरी बेटी रही शिक्षा से वंचित?

लक्ष दान तू अचल मूरत पर

क्यों कर?

साकार ब्रम्ह (असहाय) के हित

से जो अंजान है!

सुथरा बदन और चमकते वस्त्र

ये तेरी पसंद!

फिर क्यों शहर की सड़कों पर

स्वच्छता जरूरी नहीं?
बदल रहा समय और परिवर्तन नियम!

किन्तु विडंबना यह कि

बदली तेरी फितरत है।

शालीन और सभ्य तू

दुनिया के लिए, वहीं

औपचारिकता ने बदल दिए

तेरे रिश्तों के मायने।

क्यों हर दिन तू मिलता

गैरों की भीड़ से?

तेरे अपने बेकल हैं

मिलने को तुझसे!

-आरती मानेकर

कर्मयुग (New year 2015)


सच है निशिथ के साये में

भय तो किसी को लगता है।

कोई राहगीर निडर होगा

तारों को देख वो चलता है।

विश्वास उसे निज-पग में

आगे बढ़ता; चलता जाता है।

पाकर मंजिल अभिप्सित, हर्षित

ना समझो भाग्य का नाता है!

ये फल है अथक प्रयासों का

ऐसे जीवन बदला जाता है।
रावण पर राम, कृष्ण की कंस पर

यह सत्य विजय की गाथा है।

चमके जो रवि के तेज से तेज

हे भारत! वो तेरा माथा है।
कर्म-प्रेम कुंजी है आनंद की,

करो! हमें कर्मवीर कहलाना है।

स्वर्ग-सुख की व्यर्थ कामना,

धरती को धरती-सा बनाना है।

चमकेंगे स्वर्ण-सा अग्नि में तपकर

कलियुग को कर्मयुग में बदलना है!
-आरती मानेकर

नव वर्ष का नव विधान (New year 2014)

नव वर्ष का नव विधान
लहलहा रही है खेत में धान।

इस वर्ष की शुरुआत आंसुओं ने की है।
ये आँसू गम के नहीं,
खुशियों का खजाना हैं।
चल रहे हैं जिंदगी के सफर में
चलते हुए मंजिल तक जाना है।

बीता साल न जाने कैसे बीत गया!
कुछ पाया इस वर्ष में,
तो कुछ हमने खो दिया।
जीत ली हमने कोई बाजी,
तो कोई यहां हमसे जीत गया।

नए आज का मौसम है रंगमान,
ज्यों उदय हुआ इंदिरा का।
क्यों कल बिलख कर रोई थी शाम?
उसे दुख था विरह का!
शायद इसलिए चुपचाप पी गई थी जाम।

गीत बीते साल के बहुत याद आएंगे।
राग नियति और सुर जीवन का था।
अब नए चेहरों से रिश्ता हम निभाएंगे।
भूला कर गम जो मन में था,
नव वर्ष के हर दिन का जश्न हम मनाएंगे।

-आरती मानेकर

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लांछन

आह! कितना आनंदित जीवन था, जब तुम और मैं सूक्ष्म प्रेम के सूत्र में बंधे हुए थे। हर प्रभात में सूर्य की किरणें प्रेम का नया पर्याय ले आती थीं और सारा दिन उस प्रेम के पर्याय के बारे में विचार करके व्यतीत हो जाता था। हम – तुम रोज बात ना कर पाते थे, किंतु एक – दूसरे की मधुर स्मृतियाँ हमारे हृदयों को अगाध प्रेम से भर देती थीं। जानते हो, उन दिनों मेरी सखियाँ मेरी चुटकी लेती थीं कि प्रेम – प्राप्ति के पश्चात् मेरा चित्त और मेरा मुख दोनों ही पहले से अधिक प्रफुल्लित थे। मेरे तन में प्रत्येक क्षण एक अद्भुत स्फूर्ति – सी रगों का लहू बनकर दौड़ती थी और हृदय तक पहुंचकर तुम्हारे प्रेम की स्मृति कराती थी। याद है तुम्हें वह दिन, जब तुमने मेरी सखियों के समक्ष अपने प्रेमोद्गार को मुझसे प्रकट किया था। आह! लज्जा से मुख की लाली और इस अलौकिक आनन्द से हृदय का आयतन, दोनों ही क्षण – क्षण बढ़ते ही जाते थे। तुम्हारे प्रेम को अपने हृदय की अनुमति देकर मैंने स्वयं को भाग्यशाली माना था। तुम्हारी वह प्रेम मूर्ति मेरे नयनों में इस प्रकार छपी थी कि मैंने तुम्हारा चित्र भी बना लिया था। उन दिनों एक – दूसरे के प्रति कितना आदर था न! और हमारे प्रेम का विश्वास अपने चरम पर पहुंच चुका था। यह धरती और वह आकाश दोनों ही हमारे प्रेम के शाश्वत साक्षी थे। जीवन का प्रत्येक क्षण प्रेममय था। संगीत के मधुर स्वरों और गीली मिट्टी की सुरभि की भाँति तुम्हारा प्रेम मेरे हृदय को अतुलित आनन्द देता था।

किन्तु, आज! आज तुमने अपने मिथ्या प्रेम का कटु; किन्तु सत्य अनुभव कराकर मुझे स्वप्नों के अनन्त आकाश से लाकर वास्तविकता की धरती पर खड़ा कर दिया। मैं तुम्हें आज से पहले तक निष्काम प्रेम का देवता समझती थी और उसी निष्काम प्रेम से आराधक बन कर तुम्हारी भक्ति करती थी, किन्तु तुम तो कामुकता के दैत्य निकले। तुम्हारे प्रेम का जो भ्रम मेरे हृदय को हुआ था, वह आज टूट चुका है। मेरा प्रेम भौतिकता से परे असीम था, किन्तु तुम्हारा प्रेम शारीरिक सम्बंधों तक सीमित!

हाँ, मैं तुम्हारी होना चाहती थी, पूर्ण रूप से तुमको समर्पित होना चाहती थी, किंतु बिना सर्वसम्मति के अपने सूक्ष्म अलौकिक प्रेम को स्थूल लौकिक प्रेम में परिणित करना; मेरे प्रेम का आदर्श ना था। मेरे प्रेम का आदर्श तो तुम्हारी प्रेमपूर्ण सेवा करना था, सम – विषम परिस्थितियों में तुम्हारे साथ होना था, किन्तु तुम शायद इस बात को समझ ना पाए और इसलिए प्रगाढ़ होने के तुम्हारे व्यर्थ अनुनय को मेरे अस्वीकार किए जाने पर तुमने उस प्रेम के कोमल और पवित्र सूत्र को तोड़ दिया। आह! कितना कमजोर प्रेम था तुम्हारा और कितना सीमित! प्रेम कलम की स्याही नहीं है, जो उपयोग के बाद समाप्त हो जाए, प्रेम तो अथाह समुद्र का अनन्त जल है, जो अनन्त काल तक बना रहे! किन्तु तुम इस संज्ञा को कहाँ समझ पाए! वास्तव में तुमने प्रेम न किया था, तुमने तो प्रेम को केवल अपनी काम – साधना का आधार बनाया था। तुम्हारे प्रेम के अभिनय में कितनी सजीवता थी, कि मैं सहज ही इस मिथ्या अभिनय को अपने जीवन का शाश्वत सत्य समझ बैठी थी। दुष्ट हो तुम! बहुत दुष्ट हो, मेरे फैले हुए हृदय को एक क्षण में मुरझा दिया, मेरे प्रफुल्लित जीवन को एक क्षण में ही रुला दिया। नहीं! तुम दुष्ट नहीं, मेरा प्रेम इतना तुच्छ नहीं हो सकता। दुष्ट तो मेरा हृदय था, जो तुम्हारे प्रेमार्थ को ना समझ पाया। 

मैं तुम्हारे प्रेम बन्धन में सूक्ष्म रूप से बंधना चाहती थी, स्थूल रूप से नहीं! भौतिक रूप से बंधने के लिए मुझे थोड़ा अवकाश तो दिया होता। तुम अगर मुझसे रूठे होते, तो मैं तुमको मना लेती, किन्तु तुमने प्रेमांत करके मुझसे यह अवसर भी छिन लिया। ना! अब मैं तुमपर कोई लांछन नहीं लगा सकती। तुम्हारा प्रेम तो मेरे प्रति समाप्त हुआ, किन्तु तुम अनन्त काल तक मेरे लिए प्रेम मूरत बने रहोंगे। तुम्हारा सीमित प्रेम आज धरा की भाँति सीमित रह गया, किन्तु मेरा असीम प्रेम अब आकाश से भी अनन्त होगा, आजीवन!
आरती मानेकर

I just want…

I don’t want you to love me,

I just want you to trust me.
I don’t want you to hug me tightly,

I just want you to hold my hand softly.
I don’t want you to kiss my lips to seduce me,

I just want you to kiss my forehead to comfort me.
I don’t want you to call me with different names,

I just want you to call me with my name.
I don’t want you to treat me as a queen,

I just want you to treat me as your daughter.
I don’t want you to miss me everyday,

I just want you to forget me never.
I don’t want you to talk to me all time,

I just want you to listen my silence.
I don’t want you to dry up my tears,

I just want you to make me smile.
I don’t want you to be my love,

I just want you to be my life.
-Arti Manekar

निर्माणों के पावनयुग में और भी दूँ…

निर्माणों का पावनयुग है आया,

चाहती हूँ निर्माणों के पावनयुग में और भी दूँ!

शस्त्र भी दे दूँ, शास्त्र भी दे दूँ,

इस पावनयुग के निर्माण में, मैं अपना ज्ञान भी दूँ।
सपनें रंगीन सारे दे दूँ,

अरमानों के पंख फैलाकर,

मैं जिस आकाश में उड़ा करती हूँ,

चाहती हूँ वो आसमान भी मैं दे दूँ।
रक्त का वो प्रत्येक क़तरा,

खून – लहू – रक्त भी दे दूँ।

श्वास; मेरे प्राण का आधार है जो,

वो श्वास अंतिम मेरी, पावनयुग में दे दूँ।
तन – मन – धन, सर्वस्व दे दूँ।

मैं अपना बलिदान भी दे दूँ।

जीवन का प्रत्येक अमूल्य क्षण,

दिन – सप्ताह – महीने -साल,

समय पूरा मैं अपना दे दूँ।

निर्माणों के पावनयुग में और भी दूँ!

पावनयुग के इस निर्माण में,

नींव रखूं मैं अपने सपनों की।

जिंदगी के कठोर संघर्षों को ईंटें बनाकर,

इन ईंटों से मज़बूत दीवार बना दूँ।

संसार के आशीर्वाद वाली

छत भी ऊपर बना दूँ।
जब सपने होंगे मेरे पूरे,

मानो, जैसे निर्माण हुआ पूरा पावनयुग का।

अब उन रंगों से, जो मेरी जिंदगी है,

मैं पावनयुग के निर्माण का सपना रंग दूँ।
हो गया अब पूरा निर्माण पावनयुग का,

फिर भी मैं चाहती हूँ-

“निर्माणों के पावनयुग में और भी दूँ!”

-आरती मानेकर