मिट्टी का घर

काश कि मिट्टी का होता मेरा घर!
और उठते उसमें अपनत्व के स्वर…

उसका छोटा-सा दरवाजा,
अवसर देता मुझे झुकने का।
हंसी-खुशी मिलते वहाँ सब,
आनंद आता तब रुकने का।
छोटी-सी उसकी खिड़की
और छत में पड़ी दरारों से,
सूरज आता घर के अंदर
और रचता चतेवरी किरणों से।
और फर्श लीपता पवित्र गोबर,
काश कि मिट्टी का होता मेरा घर!

बड़े-से कमरे इसके इतने कि
संयुक्त परिवार समा जाए।
टाट-पटे पर बैठ रसोई में,
सब जन मिल खाना खाएं।
होती बैठक बरामदे में सबकी
और बच्चे मिल गाते गाना।
चिड़ियों का होता आवागमन,
तो मैं भी मुंडेर पर रखती दाना।
आनन्दित होता सबका उदर,
काश कि मिट्टी का होता मेरा घर!

बड़ा ही होता बहर किन्तु
चारों ओर कोई मेढ़ न होती।
संध्या को मिट्टी-पानी की सुगंध से,
समय से पूर्व आयु अधेड़ न होती।
दिन थककर सोते चैन की नींद,
रात को शीतल चाँदनी के नीचे।
अवकाश के दिन सोते हुए बच्चे
नाटक करते देर-सबेर आँखें भींचे।
और संतोषपूर्ण होती दोपहर।
काश कि मिट्टी का होता मेरा घर!

हर वर्ष करना पड़ता सुधार, किन्तु
प्राकृतिक ही होता वातानुकूलन।
बारिश में ही समस्या होती, किन्तु
सुख-शान्ति पाता वहाँ तन-मन।
शहरीकरण से प्रभावित हो मैंने,
दो वर्ष पूर्व पक्का घर है बनवाया।
भावनाओं को छोड़ो, यह तो
सर्दी में ठंडा, गर्मी में और गरमाया।
निर्णय लेने में मैं रखती थोड़ी कस्सर!
काश कि मिट्टी का होता मेरा घर!
-आरती मानेकर

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फ़नकार का जवाब

मुझे मिटा दिया, ये सोचकर, तुम जी रहे होंगे बड़ी राहत में,
लेकिन फ़नकार मरते नहीं फ़ना हो जाते हैं, फ़न की चाहत में!
तुम मुझे मार सकते हो, लेकिन मेरे जज़्बात का क्या?
मेरी कलम तोड़ दो, लेकिन उसके रोशनाई से निस्बत का क्या?
कागज़ तुम जो फाड़ दो सारे, तो फ़लक ज़मीन हो मेरे लिए,
जो मैं लिख दूँ फिर कोई गज़ल, तुम इतने हैरान हो किस लिए?

मैं अभी मर नहीं सकता कि नज़्में जावेद लिखना बाक़ी हैं,
तेरी हार और मेरी फ़तह की हसीं नावेद लिखना बाक़ी है।
दहर के दिल पर इश्क़ के अल्फ़ाज़ लिखना बाक़ी हैं,
आसमां से ऊपर उठने वाली परवाज़ लिखना बाक़ी है।बदल दूँ मैं ज़माने की चाल को, ऐसे मेरे ख़यालात लिखना बाक़ी हैं,
चर्चें तुम मेरे नाम के सुनो, उस वक़्त के तुम्हारे हालात लिखना बाक़ी हैं!
नौनिहालों को सुना सकूँ, वो किस्सा लिखना बाक़ी है,
मेरे मुल्क के फ़रोग़ में मेरा हिस्सा लिखना बाक़ी है!

-आरती मानेकर

The poem may seem weird to you, as it is the sequence to my previous poem. To understand this one, you must read my previous poem. Here is the link- कलाकार से प्रतिशोध .

Thank you…