प्रश्न अनुत्तरित…

कल परीक्षा देते समय
मन नहीं मेरा स्थिर था।
विस्मृत थे कुछ प्रश्न,
स्मृति में न कोई उत्तर था।
लेखनी ठिठकी-सी किन्तु,
अनुत्तीर्ण होने का भय न था।
मस्तिष्क साथ छोड़ देता,
ऐसा तो वो विषय भी न था।
उत्तर किस प्रश्न का लिखा जाए?
मन इसी ऊहापोह में था।
प्रश्न सरल ही थे, किन्तु मन
कौन जाने किस टोह में था!
अंततः किया एक भरसक प्रयास
और किया लेखनी को त्वरित!
उत्तीर्ण होने की मंशा से मैंने
नहीं छोड़ा कोई प्रश्न अनुत्तरित!

वापस आकर के विचार किया-
पाया, जिंदगी भी एक परीक्षा है।
ये प्रतिपल ही करती है प्रश्न,
हर उत्तर की इसे प्रतीक्षा है।
कठिन लगते हैं कभी प्रश्न इसके,
उत्तर देने में कभी हिचकिचाहट।
चिंतित हो जाता है फिर मन,
व्यवहार में होती है बौखलाहट।
उत्तर तो सबके ही पास है,
क्यों न जिंदगी से बात की जाए?
सफलता-विफलता को बगल में रख,
क्यों न लिखने की शुरुआत की जाए?
कई समस्याएँ हल हो जाएँगी,
यदि हम उत्तर दें हृदय से पारित!
इसके अर्थों को संज्ञान में लें,
क्यों ही छोड़े इसके प्रश्न अनुत्तरित?
-आरती मानेकर

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Guest Post- कलयुगी बेटा

वक्त ने कैसी करवट खायी!
आज है धरती पर मानव ने
धरती के ईश्वर, माँ-बाप की
क्या खुब है हालत बनायी!
कल तक थे घर के मालिक,
आज है नफरत हिस्से आयी।
खुशी जीवन भर की अपनी,
बेटों पर हँसते-हँसते लुटायी।
अब बेटों के मन में माँ-बाप
बन गये आँखों की कंकरायी।
जिनके कन्धों पर बचपन ने
जीवन की पहली सुधि पायी,
आज है बेटों के मति भ्रम ने
माँ-बाप से छिनी खुशितायी।
कभी घर में थी अधिकारिता
बेटों ने आश्रम राह दिखायी।
भूल गये माँ-बाप की ममता
वक्त ने दुनियादारी सिखायी।
बुढ़े माँ-बाप को दे दी अब
बेटों ने घर से अन्तिम विदाई।
अब जीवित होकर भी बुढ़े
सहते बेटों की मृत स्नेहताई।
बुढ़ी आँखें आँसू बहा देती,
बेटों के कटु वचनों को भूला,
फिर भी आशीष सदा देती।
वृद्धाश्रम में पथराई आँखें
दरवाजे से अक्षर टकरा लेती।
सहकर बेटों की निर्दयता,
माँ-बाप की छाती जला देती।
बेटों के आने की आशा में,
बुढ़ी साँसें जीवन बिता लेती।
पर बेटा तो वक्त के चलन में
बिसर गया माँ-बाप की लोरी,
भूल गया बुढ़ों की प्रेम की होरी।
अब माँ-बाप है जग में बोझा होते,
बेटों को जीवन देने पर भी
माँ-बाप है वृद्धाश्रम में रोते।
बेटे हाथ पकड़ उँगली सहारे
जिनसे सीखे अपने पग चलना,
अब वह माँ-बाप तो घर से तारे
वक्त ने बाँधा यह सब समां।
माँ-बाप का बेटा हो गया जवां,
अब बेटा बोझ बने माँ-बाप को
तकलीफों का देगा गुलदस्ता।
हाथ पकड़ जिनसे चलना सीखा,
अब हाथ पकड़ अपने घर से
वृद्धाश्रम भेजेगा दिखा के रस्ता।
यह वक्त ने चाल चलायी है-
बेटों ने धरती के ईश्वर माँ-बाप की
कैसी नरकवत हालत बनायी है।
-अनिल कुमार
वरिष्ठ अध्यापक ‘हिन्दी’
ग्राम देई, जिला बून्दी, राजस्थान

आज कोई उपसंहार या भूमिका नहीं बाँधूँगी। केवल इतना कहना चाहूँगी कि यह कविता वर्तमान समय के अनुरूप सार्थक है।

चार पल की ज़िंदगानी (Guest Post)

एक तरफ मंजिल थी, एक तरफ वो,
उसने कहा तुम बढो़ आगे चाहे जो भी हो।
जब मैं लौटा…
मुझे बस मिली उसकी एक निशानी, एक खत,
जिसमें लिखा था- “अमर बनाना हमारी कहानी।”
मुझे लगा, अब कि मैंने उसको खो दिया,
बिन पलकें भिगोए, मैं भी जी भर के रो दिया।
इतने में देखा मैंने-
वो तो दुल्हन बन कर खड़ी थी!
ना जाने वो कैसा मंजर था, कैसी घड़ी थी!
मैं उसको कुछ भी ना कह सका,
उससे नजरें चुराए बिन, ना रह सका।
मुझे इस हाल में देख वो मेरे पास आई,
धीरे से मुझसे कहा, “मैं हूँ तुम्हारी परछाई!
मैंने खो कर फिर से तुमको पाया है,
तुम्हारे साथ जीने का हक, तुमसे ही कमाया है!
रोको अपने आँसू!
इतनी जल्दी तुमसे दूर नहीं जाऊँगी।
वादा था ना तुमसे, ये साथ उम्र भर निभाऊँगी।”
मैं हैरान सा हो गया, उसकी ये बातें सुनकर,
फिर उसने कहा-

“देखो!
हमारी शादी के लिए खरीदा है ये जोड़ा, लाखों में चुनकर।”
मैंने खुशी से उसको गले लगाया,
अपनी तेज धड़कन से रुबरु कराया,
फिर कहा- “देखो!
मुझे भी अपनी बाकी जिंदगी, तुम्हारे साथ बीतानी है,
आओ जी भर के जी लें, ये जो चार पल की जिंदगानी है।”

-नीरज कुमार महंत ‘स्पर्श

नीरज जी की कविताएँ आप पहले भी मेरे ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं। जो पाठक नहीं पढ़ पाए, उनके लिए लिंक है- Guest Post.

आप भी अपनी कविताएँ मेरे ब्लॉग पर प्रकाशन हेतु मुझे इस पते पर भेज सकते हैं-

mailto:artimanekararti@gmail.com

वो मेरे शब्दों में दिखता है

मोहब्बत में ना चलो चालें, इसका सीधा रासता है,
तू उसको देख करके हँस, जो तुझे पाकर के हँसता है।
तुम बैठे हो मुझे पढ़ने, मैं उसका नाम नहीं लूँगी,
मैं उसका जिक़्र क्या कर दूँ, वो मेरे शब्दों में दिखता है।

वो मेरी रात का चन्दा, दिन के सूरज-सा है,
मुझे उसकी जरूरत है, वो मेरा बेगरज-सा है,
वो मेरी जिंदगी में है, ख़ुदा के तोहफ़े की तरह,
कि उसका नाम मेरे दिल पर अमिट दरज-सा है।

मैं उसको शिव ही कह दूँ तो कोई जिद्दत नहीं होगी,
सच कहती हूँ मेरे इश्क़-सी तेरे इश्क़ में शिद्दत नहीं होगी,
महीने आठ हैं बीत गए, जब उसका दीदार किया मैंने,
कि इससे लम्बी किसी के मिलन की मुद्दत नहीं होगी।

तुम उसका जिक़्र करते हो, मैं कितना शरमाती हूँ,
देखा तो होगा तुमने मैं अकेले में कैसे मुस्कुराती हूँ।
मैं कली हूँ अधखिली, वो जरूर ही धूप है!
कि उससे मिलते ही मैं फूल बनके खिलखिलाती हूँ।

सुनो एक राज की है बात, मैं फ़क़त तुमसे कहती हूँ,
मैं अपने घर से ज़्यादा अब उसके ख्यालों में रहती हूँ।
एक दिन उसकी बाहों में सुकून मिलेगा बहुत ज़्यादा,
बस इसी उम्मीद में आज मैं उससे दूरी ये सहती हूँ।

उसका जिक़्र कर पाऊँ, मैं ऐसी ग़ज़ल ढूँढ़ती हूँ,
उर्दू की ना मिलेगी, तो हिंदी में नई सजल ढूँढ़ती हूँ।
बसता है आँखों में मेरे, रोशनी है वो शायद,
अब नहीं मैं आँखों से गुम हुआ काजल ढूँढ़ती हूँ।

वो कुछ रूठा है मुझसे, मैं एक दिन उसे मनाऊँगी,
उस प्यार भरे दिल को मैं तब सीने से लगाऊँगी,
फ़िलहाल छोड़ो ये किस्सा, तुम वाहवाह कह डालो!
उसे मेरे पास आने दो, मैं अपनी वफ़ा जताऊँगी।

-आरती मानेकर