Guest Post- कलयुगी बेटा

वक्त ने कैसी करवट खायी!
आज है धरती पर मानव ने
धरती के ईश्वर, माँ-बाप की
क्या खुब है हालत बनायी!
कल तक थे घर के मालिक,
आज है नफरत हिस्से आयी।
खुशी जीवन भर की अपनी,
बेटों पर हँसते-हँसते लुटायी।
अब बेटों के मन में माँ-बाप
बन गये आँखों की कंकरायी।
जिनके कन्धों पर बचपन ने
जीवन की पहली सुधि पायी,
आज है बेटों के मति भ्रम ने
माँ-बाप से छिनी खुशितायी।
कभी घर में थी अधिकारिता
बेटों ने आश्रम राह दिखायी।
भूल गये माँ-बाप की ममता
वक्त ने दुनियादारी सिखायी।
बुढ़े माँ-बाप को दे दी अब
बेटों ने घर से अन्तिम विदाई।
अब जीवित होकर भी बुढ़े
सहते बेटों की मृत स्नेहताई।
बुढ़ी आँखें आँसू बहा देती,
बेटों के कटु वचनों को भूला,
फिर भी आशीष सदा देती।
वृद्धाश्रम में पथराई आँखें
दरवाजे से अक्षर टकरा लेती।
सहकर बेटों की निर्दयता,
माँ-बाप की छाती जला देती।
बेटों के आने की आशा में,
बुढ़ी साँसें जीवन बिता लेती।
पर बेटा तो वक्त के चलन में
बिसर गया माँ-बाप की लोरी,
भूल गया बुढ़ों की प्रेम की होरी।
अब माँ-बाप है जग में बोझा होते,
बेटों को जीवन देने पर भी
माँ-बाप है वृद्धाश्रम में रोते।
बेटे हाथ पकड़ उँगली सहारे
जिनसे सीखे अपने पग चलना,
अब वह माँ-बाप तो घर से तारे
वक्त ने बाँधा यह सब समां।
माँ-बाप का बेटा हो गया जवां,
अब बेटा बोझ बने माँ-बाप को
तकलीफों का देगा गुलदस्ता।
हाथ पकड़ जिनसे चलना सीखा,
अब हाथ पकड़ अपने घर से
वृद्धाश्रम भेजेगा दिखा के रस्ता।
यह वक्त ने चाल चलायी है-
बेटों ने धरती के ईश्वर माँ-बाप की
कैसी नरकवत हालत बनायी है।
-अनिल कुमार
वरिष्ठ अध्यापक ‘हिन्दी’
ग्राम देई, जिला बून्दी, राजस्थान

आज कोई उपसंहार या भूमिका नहीं बाँधूँगी। केवल इतना कहना चाहूँगी कि यह कविता वर्तमान समय के अनुरूप सार्थक है।

चार पल की ज़िंदगानी (Guest Post)

एक तरफ मंजिल थी, एक तरफ वो,
उसने कहा तुम बढो़ आगे चाहे जो भी हो।
जब मैं लौटा…
मुझे बस मिली उसकी एक निशानी, एक खत,
जिसमें लिखा था- “अमर बनाना हमारी कहानी।”
मुझे लगा, अब कि मैंने उसको खो दिया,
बिन पलकें भिगोए, मैं भी जी भर के रो दिया।
इतने में देखा मैंने-
वो तो दुल्हन बन कर खड़ी थी!
ना जाने वो कैसा मंजर था, कैसी घड़ी थी!
मैं उसको कुछ भी ना कह सका,
उससे नजरें चुराए बिन, ना रह सका।
मुझे इस हाल में देख वो मेरे पास आई,
धीरे से मुझसे कहा, “मैं हूँ तुम्हारी परछाई!
मैंने खो कर फिर से तुमको पाया है,
तुम्हारे साथ जीने का हक, तुमसे ही कमाया है!
रोको अपने आँसू!
इतनी जल्दी तुमसे दूर नहीं जाऊँगी।
वादा था ना तुमसे, ये साथ उम्र भर निभाऊँगी।”
मैं हैरान सा हो गया, उसकी ये बातें सुनकर,
फिर उसने कहा-

“देखो!
हमारी शादी के लिए खरीदा है ये जोड़ा, लाखों में चुनकर।”
मैंने खुशी से उसको गले लगाया,
अपनी तेज धड़कन से रुबरु कराया,
फिर कहा- “देखो!
मुझे भी अपनी बाकी जिंदगी, तुम्हारे साथ बीतानी है,
आओ जी भर के जी लें, ये जो चार पल की जिंदगानी है।”

-नीरज कुमार महंत ‘स्पर्श

नीरज जी की कविताएँ आप पहले भी मेरे ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं। जो पाठक नहीं पढ़ पाए, उनके लिए लिंक है- Guest Post.

आप भी अपनी कविताएँ मेरे ब्लॉग पर प्रकाशन हेतु मुझे इस पते पर भेज सकते हैं-

mailto:artimanekararti@gmail.com

Guest Post

नमस्कार!

काफी दिन से आप सब मेरे ब्लॉग पर केवल book reviews ही पढ़ रहे होंगे। नयापन लाने के लिए मैंने अपने ब्लॉग पर एक नए उपक्रम- Guest Post की शुरुआत की है। इसके चलते मैं यथावसर नए-नए कवि मित्रों की कविताएँ मेरे ब्लॉग रूपी मंच से प्रेषित करती रहूँगी।

मेरे ब्लॉग पर आज नीरज कुमार महंत जी की दो कविताएँ- इज़हार

एक खत माँ के नाम

प्रस्तुत हैं-

इज़हार
तुम्हें प्यार करने को जी चाहता है,
क्या कहें तुम कितनी खास हो,
तुम्हारी मुस्कान से हम भी खिल उठते हैं,
मेरे लिए तुम खुशी का एहसास हो

हर रात तब भी आ कर गुज़र रही थी,
जब तुम मुझसे मीलों दूर थी,
तुम्हारा आना जाना तो लगा ही रहता है ख्यालों में मगर,
मेरे होठों पर भी तुम उतनी ही मशहूर थी

तारिफ मैं कर दूं कुछ, दिल में तमन्ना हमेशा रहती है,
तुम्हारा ही हूँ मैं, मेरी चाहत मुझसे ये हमेशा कहती है,
याद होगा तो याद कर लेना,
आज भी दिल के किसी किसी शहर में,
मेरे नाम की फ़िकर आज भी तेरे अंदर रहती है

तुझपे सारी दुनिया हार जाने का दिल करता है,
एक बदनसीब आशिक है जो तेरी मुस्कान के लिए मरता है,
तेरे लिए तो उस चांद का भी कोई मोल नहीं,
जो हर रात अपनी खूबसूरती दिखाने को सँवरता है

सच तो ये है कि मैं जानता हूँ कि,
तुम मेरी वो चाहत हो,जो पूरी नहीं हो पाएगी,
फिर भी मेरी आँखों की नमी तुझसे हो कर हमेशा ही जायेगी,
खुश रहना हमेशा तुम बस यही दुआ करता हूँ,
अपनी तमन्ना को बाजू रखकर,
तुम्हारी मुस्कान के लिए मरता हूँ।
एक खत माँ के नाम
तेरे चेहरे से ये मुस्कान कभी ना जाये,
चाहा हमेशा है कि मेरी भी उमर तुझको लग जाये,
खुद के लिए अब बस यही दुआ करती हूँ,
हमारे सर से तू कभी अपना हाथ ना हटाये।
अपने आँचल में छुपा लेना माँ,
अगर मुझसे कोई गलती हो जाये

अपनी गोद में ही सुला देना

,

जब मुझको कहीं भी नींद ना आये।
तुमने मुझको जनम दिया है माँ,
कुछ भी कर दूं तेरे लिए कम ही पड़ जाये

अपनी ममता बरसाते रहना माँ,
चाहे तेरी बेटी कितनी भी बड़ी हो जाये।
मुझसे कभी नाराज़ मत होना माँ,
कभी तकलीफ नहीं दूंगी, चाहे कुछ भी हो जाये

प्यार से समझाना या माफ़ कर देना,
जब भी मेरा मन तुझको समझ ना पाये ।

तुम्हारी बेटी।

-नीरज कुमार महंत

परिचय: नीरज मूलतः झारखंड से है। वे कहते हैं कि वे गलती से अभियंता हुए हैं, रुचि तो उनकी लेखन में रही है। लघुकथाओं तथा कविताओं के अतिरिक्त वे Two Letters नामक पुस्तक भी लिख चुके हैं।

आप भी अपनी कविताएँ मुझे निम्न पते पर भेज सकते हैं-

artimanekararti@gmail.com

धन्यवाद!

-आरती मानेकर

वो देखो डॉक्टर , मारो साले को।

डर लगता है रास्ते पर चलने से
डर लगता है घर से निकलने से
डरता हूँ मैं अस्पताल में काम करने से
डरता हूँ मैं मरते इंसान को बचाने से
क्या करूँ मन से इस डर को निकालने को
वो देखो डॉक्टर, मारो साले को।

जब छोटा तब मरीज की सेवा करने का जूनून था
डॉक्टर बनूँगा , ये बोलने में ही सुकून था
लोग कहते “आप का बेटा बहुत होशियार है डॉक्टरी में लगा दो, करियर तैयार है”
हुए तैयार जी तोड़ मेहनत करने को
वो देखो डॉक्टर , मारो साले को।

घर से सालों-साल दूर रहा मैं
दिन-रात किताबों में डूबा रहा मैं
जब अपनी जवानी मरीजों के संग बिताई
तब जाकर डॉक्टरी कुछ समाज में आई निकला था मैं रोगी की सेवा करने को
वो देखो डॉक्टर , मारो साले को।

जब मेरे दोस्त इंजीनियर बन डॉलर कमा रहे थे
मेरा खर्चा तो मेरे पापा उठा रहे थे
इधर घरवाले शादी-ब्याह-त्यौहार अकेले मनाना सीख रहे थे
उधर हम पेशाब-टट्टी-खून की जांच से जूंझ रहे थे
पढ़ते रहे हम हज़ारों पन्ने मुख़स्त कर जाने को
वो देखो डॉक्टर , मारो साले को।

सुना था डॉक्टरी बहुत ही ऊँचे दर्जे का काम है
क्या पता था, ऊँचे दर्जे का तो सिर्फ नाम है
आज भी आँखें उस इंसान को ढूंढ़ती है
जो कहता था, डॉक्टर बनने से इज़्ज़त मिलती है
जी करता है उसी को डॉक्टर बनाने को
वो देखो डॉक्टर , मारो साले को।

मिर्गी का दौरा लेकर भर्ती हुआ एक बच्चा था
दवाइयाँ दी सब, लेकिन परिणाम न कुछ अच्छा था
दो दिनों से ड्यूटी था मैं कर रहा
आँखों में नींद, शरीर था मेरा थक रहा
लगा हुआ था फिर भी उसकी जान बचाने को
वो देखो डॉक्टर, मारो साले को।

आँखों के सामने अंधकार छा रहा था
मृत्यु की ओर बच्चा खिंचा जा रहा था
कोशिश की बहुत यम से जीतने उसकी जान को
पर बचा न सके हम उस नन्ही जान को
कोस रहा था मैं जब उपरवाले भगवान को
सामने से आवाज़ आई –
“वो देखो डॉक्टर, मारो साले को।”

-डॉ. सुमित पेड़ीवाल

About the author:

Dr Sumit Periwal is a doctor by profession, Paediatrician and Echocardiographer practicing in Gangtok, Sikkim. He has passed his MBBS in 2010 from SAIMS Medical College, Indore and completed DNB Pediatrics from Dr B C Roy PGI of Pediatric Sciences in Kolkata. He has special interest in Pediatric Echocardiography and Vedic Mathematics.

This poem was written in anguish over assault on doctor in Dhule, Maharashtra.

He started the petition “People assaulting doctors must be punished like terrorists” which has been viewed over 20 lakh times, shared over 5 lakh times and signed by 4 lakh people.

Even with his busy schedule, he finds time to run, cycle, play guitar and sometimes write.

Happy Doctor’s Day….
The presented poem is written by a doctor himself showing the conditions of doctors in our society. 😇