प्रथम शतक

प्रथम से शुरू की, शतक हो गईं,
कविताओं का सिलसिला यूँ चल रहा है।
शब्दों की बाती, भावनाओं के तेल वाला
दीया आठ वर्षों से जल रहा है।
‘जिन्दगी’ तो माँ से ही शुरू है,
लेखन भी ‘माँ’ से शुरू किया;
‘सपनों से सच’ लिखने लगी थी मैं,
‘दोस्ती’ को कविताओं में विशेष स्थान दिया।
‘द्वन्द्व’ था कि ‘सावन’ ‘प्यार का इजहार’ है,
‘गाफिल’ मैं थी और था ‘चाँद ख्वाहिश का’।
‘बेईमान अल्फाज़’ मेरे ‘बदलाव’ की ‘बात करते हैं’,
लेकिन ‘दुआ’ पूरी होने को इंतजार था ‘बारिश’ का।
‘नजर का असर’ दिल ‘राही’ पर कुछ हुआ,
जैसे ‘नई जिंदगी’ की ‘वजह’ मिल रही है।
‘प्यार वाला किस्सा’ लिखूँ कि ‘सुनो ओ प्रियतम’,
‘आव्हान’ के ‘शब्द’ ‘भोर’ में ‘चिड़िया’ सुन रही है।
सुनो कि ‘उम्मीद’ नहीं अब ‘तुम्हारी नाराजगी’ ठीक हो,
‘शून्यावस्था’ से परे ‘मेरा मौन’ मैंने ‘आज लिख’ लिया।
‘सुकून’ है तुम्हारी ‘आवाज’ में, इसलिए ‘लिखने दे’;
‘तुम्हारी प्रतीक्षा’ में ‘समझौता’ ‘खोखले रिश्ते’ से किया।
‘हे कविते!’ तू ‘गुरु’ बनी, माँ बन सुनाई ‘लोरी’,
‘खेल’-खेल में मुझको ‘नियति की असलियत’ बताई।
‘समाज का उलाहना’ मिले ये ‘कोई जिद्दत नहीं है’,
तुझको सखी मान मैंने ‘पहले मिलन की बात’ बताई।
हास्य, रति, क्रोध, वत्सल, भय, शोक;
उत्साह, निर्वेद, सभी स्थायी भावों का समावेश है,
कुछ सुखद कल्पनाएँ, कुछ है अनुभित भावनाएँ,
कमी है, किंतु इनमें बनावट न लवलेश है।
मैंने अपना सुख-दुःख सारा इनसे ही बांटा,
इन्होंने केवल मुझसे मेरा थोड़ा समय माँगा है।
आँखों से होठों तक सारे भाव इनसे जुड़े,
इनसे मेरा मृत्यु तक का जीवन साँझा है।
लिख पाना सरल नहीं, शब्द, भावनाएँ, साहित्य
और जिंदगी की सीखों की महरबानी है।
कई लोगों का साथ मिला, भाषाएँ भी नई अपनाईं,
‘प्रथम शतक’ पूरा हुआ, ये संघर्षों की कहानी है।
-आरती मानेकर

So here I complete the first century of my poems with the start of new year…

Thanks to everyone for believing me and reading me….

Keep reading…

Keep encouraging me….

I’ll keep writing…

And at last a very happy new year….

Enjoy life…😊

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​अंतिम रचना

फिर-फिर उठी है उमंग आज 

कि लिख दूं कल्पना अंतिम मेरी!

कि लिख दूं रचना अंतिम मेरी !

कि तुम हो वो सुधा,

जो जीवित रखे है मन मेरा!

कि तुम हो वो विधा,

जिससे संतुष्ट हो मन मेरा!

हो चिर युद्ध में विजय का

शाश्वत उपहार तुम!

हो तिलमिलाती धूप दिन की 

पुष्प रंजित शाम तुम!

हो श्वास तुम अंतिम कोई 

हो उठा स्वप्न साक्षात कोई 

हो प्रेम का सारांश तुम 

हो जीवन का उपसंहार भी!

कि तुम नहीं केवल कृति 

हो मेरा प्राण तुम, मेरा मान तुम।
-आरती मानेकर

दोहे

नमस्कार मित्रों! 

इस बार रचना को एक नया आयाम दिया है।

कविता के शाब्दिक अनुशासन को छंद कहते हैं।

इस बात का ध्यान रखते हुए आज पहली बार शब्दों को छंद में पिरोने का प्रयत्न किया है। आशा है आप सभी को पसंद आए। प्रशंसा और आलोचना दोनों ही सादर आमन्त्रित हैं।😊

लिखती रही हूँ मुक्तक, लिखूँ छंद इस बार।
करती हूँ आरम्भ मैं, अवश्य रखें विचार।।1।।

दिन दीन के बीत रहें, निशदिन इसी विचार।

आम-आम के होंगे कि, बढ़ेगी ये कतार।।2।।

गुण-अवगुण सब जानकर, मन से ले अपनाय।

गलती पर जो डाँट दे, सच्चा मित्र कहलाय।।3।।

अंतर्जाल के युग में, खोया तू इस प्रकार।

सूध-बूध तो खोय दी, क्यों भूला संसार।।4।।

धन-दौलत अरु नाम का, तज दे तू अभिमान।

मन्दिर अरु शमशान में, राजा-रंक समान।।5।।

समय पड़े ते तज दे, जो तरकश के तीर।

धर्मरक्षा कर्म जिसका, सो राजा अरु वीर।।6।।

अवनि-अग्नि-अम्बर-अनिल, जल; तत्व ये अमूल्य।

संवर्धन का भान हो, प्रकृति जननी तुल्य।।7।।

मीरा नहीं; किन्तु अमर, कृष्णभक्ति के गीत।

अंत बाद भी संग हो, वही निस्वार्थ प्रीत।।8।।

नीति की अनेक बातें, कहते चारों वेद।

किन्तु मानव भूल गया, भले-बुरे का भेद।।9।।

प्रातः उठ पूर्ण मन से, नित्य-नियम कर ध्यान।

ईश स्मरण वर्धित करे, काम-नाम अरु ज्ञान।।10।।
-आरती मानेकर

हम हिन्दी जानते हैं..

हां, हम भारतीय हिन्दी को माँ मानते हैं,

गर्व है हमें कि हम हिन्दी जानते हैं।
आज राष्ट्रभाषा के इसी विश्वास पर,
आओ एक दृष्टि धरे, हिन्दी के इतिहास पर।
कहाँ गई कबीर की अमृत वाणी,
और तुलसी की वो राम कहानी।
वो अलंकार- रूपक या भाँतिमान,
छंद रोला-दोहा के छप्पय समान।
वो कृष्ण-राधा प्रेम का रस श्रृंगार,
रौद्र को व्यक्त करते नेत्रों में अंगार।
दस रसों की पद्य में जिजीविषाएँ,
और गद्य की लिखित विविध विधाएँ।
न रही लेखनी आलोचकों से निर्विवाद,
प्रकृति प्रेम से पूरित ‘प्रसाद’ का छायावाद।
कहाँ गए वो मुंशी जी-‘उपन्यास सम्राट’,
और हिन्दी साहित्य का इतिहास विराट।
हिन्दी के स्वर्णिम इतिहास से हम दूर हैं,
अल्पज्ञानी हैं हम और मद में चूर हैं।
आधुनिकता के विष से ऐसे संक्रमित हैं,
हम हिन्दी जानते हैं, इस बात से भ्रमित हैं।

-आरती मानेकर
सभी हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं…!😊

शब्द

अक्षर-अक्षर
मिल बन जाना,
कोई शब्द नया-सा
अपना हो या अंजाना।
सुंदर-सुंदर शब्द
मनभावन,
हर्षित, पुलकित
मोहित हो मन।
ओ शब्द, गरल
न तुम हो जाना,
तोड़ न देना कोई
रिश्ता पुराना।
रिश्तों में मिश्री
तुमसे ही हो,
प्रसन्नता का तुम
सबब बन जाना।
पहचान मेरी
तुम ही बनो
और रचना की तुम
गरिमा बन जाना।

-आरती मानेकर

हे कविते!

हे कविते! तू  क्या है?
माला है मोतियों की तू सरल
अल्फ़ाज़ तेरे अनमोल मोती हैं।
तेरे हर एक अक्षर -अंग में
हर कवि की भावना होती है।
तू आग है, तू राग है, तू रंग है,
जैसे मेरे जीवन में तेरा संग है।
किसी प्रेमी के राज-ए-दिल की अभिव्यक्ति का
तू एक आसान -सा ज़रिया है।
आसमान में पंछी-सी उड़े तू
बागों में खिले, वो कलियाँ हैं।
तू लगे गुरु-सी, है सखी भी तू
तू उमंग भरे, मैं बातें बाँटू!
तू खुशी भी मेरी, मेरा प्रेम भी तू
रचना में तेरी मैं रातें काटू।
लगे कभी तू गरल, कभी सोम है,
क्या पत्थर को बनाती तू मोम है?
तू धूप है, तू छांव है
मेरे सपनों वाला तू गाँव है।
तू आनंद है, रोमांच का जाम है
तू जीवन की सुबह, तू ही शाम है।
हर प्रश्न का मेरे तू उत्तर है
तू ज्ञान, तेरा अर्थ महत्तर है।

-आरती मानेकर

My favorite poem from my collection…
It shows the relation of me with poems…😊😊😊😊😘😘