एकांत में रोता है मेरा मन…!

विकसित समाज, तिस पर आज के युग की विषमताएं

समय का दुरुपयोग और जी न पाने की विडंबनाएं

बिगड़ी हुई तस्वीर को फिर बना पाने की कल्पनाएं

कुछ भी कर न पाएं, मन केवल पछताएं

दावानल में जलता उपवन,

एकांत में रोता है मेरा मन।
कभी परिस्थिति से मजबूर बच्चे भिक्षुक बन जाते हैं

पुस्तक की जगह तब हाथ में भिक्षापात्र थम जाते हैं

करते मजबूरन काम कभी, हाथ में छाले आ जाते हैं

देख खेलते बच्चों को वो, आह भरकर रह जाते हैं

खोते देख उनका चंचल बचपन,

एकांत में रोता है मेरा मन।

कभी वसुधा का बंजरपन, कभी लड़ाई श्याम घनों की

मेहनत होती असीम किन्तु, मिलती न कौड़ी अनाजों की

कभी प्रकृति की नाराजगी, कहीं ज्यादती इंसानों की

कहीं अन्न की खूब बरबादी, होती आत्महत्या किसानों की

क्षत-विक्षत होता है तब मन,

एकांत में रोता है मेरा मन।
जब भावी बेटी की मां, गर्भपात करवाती है

जब केवल पुत्रजन्म की लालसा, मन में घर कर जाती है

तब ममता कोने में पड़ी, रक्त अश्रु बहाती है

उसके करुण रुदन की ध्वनि, कानों तक न आती है

देख गूंगे समाज का बहरापन,

एकांत में रोता है मेरा मन।
एकांत काली रात में, सड़कों पर सुरक्षा का अभाव

शर्मनाक दुर्घटनाओं का, उसके मन पर दुष्प्रभाव

शंका, घबराहट, डर, मन में उमड़े विविध विभाव

तेज कदम, सहमी-सी आंखें, डर दर्शाते उसके अनुभाव

और होता द्रोपदी का चिर-हरण,

एकांत में रोता है मेरा मन।
जब मेरी कलम की नोंक ह्रदय पर चोट नहीं कर पाती है

जब मेरी लिखी कोई रचना, कल्पित कृति कहलाती है

जब शब्द-मुक्ता की माल विस्मय नहीं जगाती है

जब छज्जे पर रखी किताब कोई बदलाव नहीं ला पाती है

कलंकित होती कवि की कलम,

एकांत में रोता है मेरा मन।

-आरती मानेकर

https://youtu.be/yrVBldcUUkk

ऐ शराबी…

ऐ शराबी!

करती हूं तुझसे एक प्रश्न अभी –

कब मदिरापान किया था 

तूने पहली बार?

क्या उर था तेरा उन्माद भरा?

या था किसीका तुझ पर दुराधिकार?

क्या पीते समय जरा भी तुझे,

परिवार की याद न आई थी?

तेरे बाद क्या होगा तेरे अपनों का,

क्या ये चिंता न सताई थी?

तूने मदिरा के पान से 

अपना उदर तो सड़ा दिया,

बनकर शराबी तूने तो,

अपनी मां की कोख को कलंकित कर दिया।

और गर्वित पिता का तूने 

मद मिट्टी में मिला दिया।

क्या सोचा नहीं तूने ये कभी

कि तेरी अर्धांगिनी पर क्या बीतेगी?

हेय दृष्टि से देखी जाएगी वो,

भीड़ में शर्म से पानी हो जाएगी!

क्या ये भी नहीं सोचा तूने,

कि तेरे बेटे कल

शराबी के पूत कहलाएंगे?

और केवल तेरी करनी से

वो आगे नहीं बढ़ पाएंगे!

कर फिक्र कि तेरी बिटिया को

तुझे कल को बिदा कराना है!

अगर रहा तू पड़ा नशे में कहीं,

वो दरिंदों के हाथों पड़ जाएगी।

छोड़ इनको, न कर चिंता इनकी,

ये तो जैसे-तैसे जी लेंगे,

लेकिन तेरे अंदर बसे भगवान का क्या?

जो करता सदा चिंता तेरी!

अपघातों का तूने आव्हान किया,

किया मुद्रा का तूने असीम ह्रास,

त्यौहारों की गरिमा को 

तूने लातों उछाल दिया।

अतिथियों का तूने 

कभी नहीं सम्मान किया।

क्या रसना पर तेरी, तेरा वश नहीं?

है तू खुद का या परवश कहीं?

तेरे पीने की कोई वजह 

न अब तक पता चली मुझको,

ऐसा भी क्या गम था तुझको!

संसार को तो तू भूल गया 

और बनाया शत्रु स्वयं को।

मैं जानती हूं, है तेरे अंदर भी 

एक अच्छा इंसान,

किंतु मदिरा होकर हावी तुझपर

खूब मचाती हाहाकार।

अपशब्दों के बाण चलाकर 

रिश्तों में डालती दरार।

मयखानों को बंद कराऊं,

इतनी औकात नहीं है मेरी!

सरकार को दोष दूं तो क्या!

उसको तो देश चलाना है।

मैं तो तुझसे अनुरोध कर सकूं,

मुझे अपना घर बचाना है!

-आरती मानेकर