विवशता…कलम की!

क्या है विवशता,
कलम की?
हाँ मेरी ही है ये,
किन्तु,
मेरे ही विचारों को
क्यों न उतार पाती,
कागज पर!
उसी कागज पर,
जिस पर ये लिखती
शब्द कई
और करती बातें
दुनिया से,
दुनिया की।
कभी हँसी बाँटती,
कभी दुःख में भी
वाहवाही बटोरती,
कभी सत्य का समर्थन करें,
कभी कल्पनाओं को
वास्तविकता के पटल पर
उकेरती
और
जीवंत कर देती
किसी की सोई हुईं यादें!

आज तक
किए कलम ने
हैं कितने ही चमत्कार!
किन्तु क्यों सूखी है
स्याही इसकी?
क्यों टूटी है
नोंक?
या शायद
रूठी हुई है
स्वयं कलम?
कि क्यों नहीं
बचा है मेरा अधिकार?
मेरे अंतस के
एकाकीपन में भी
क्यों है इसे
मुझपर धिक्कार?

-आरती मानेकर

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बेईमान अल्फाज़

मैंने जब गम लिखना चाहा

तुमने आंसुओं को आवाज दी,

खुशी बांटनी चाही जग से

अहसासों को तुमने पहचान दी।

 

जग के हित की बात लिखकर

बने मेरी तटस्थ पहचान तुम,

फिर जब बारी इश्क की आई,

हुए क्यों मुझसे बेईमान तुम?

 

बात तो बस इतनी-सी थी न,

कि मुझे उनसे मोहब्बत हो चली थी!

लेकिन तुम यों खफ़ा हुए।

क्या मैं तुमसे कहीं दूर चली थी?

 

सच कहूं, तुम्हारी सारी बातें,

मेरे पिया चाव से पढ़ते हैं।

तुम दिल हो मेरा, वो जानते हैं,

वो भी तुमको ही खुदा मानते हैं।

 

गलतफहमी तो अब दूर हुई,

तुम वापस जिंदगी में आओ न!

लिखूंगी इश्क मैं मेरा-तुम्हारा,

तुम भी अपनी वफा जताओ न!

 

-आरती मानेकर

राही

मैंने यादों को बंद किया

लोहे की संदुकची में

और चल पड़ा हूं मैं

सपनों की दिशा में।

अपनों को पीछे छोड़कर

अधरों पर झूठी मुस्कान लिए

जी रहा हूं मैं

बेचारों की सी दशा में।

मैं सपनों को सच कर दूंगा

बेरंग आज को स्वर्णिम कल कर दूंगा।

हां, कुछ पीछे छूट रहा है

तन के अंदर मन टूट रहा है।

नव जन मेरे साथ सही है

यह एकांत का पर्याय नहीं है।

शंकाओं से बोझिल मन है

थका हुआ, कार्यरत तन है।

शोर मन में अब ज्यादा है,

प्रतिद्वंद्व का लगा तांता है।

मेरे पग कहीं रुक ना जाएं

सब सपनें कहीं टूट ना जाएं।

अथक प्रयास अंवरत जारी है

नियति की भी अब बारी है।

विश्वास और शुभाशिष कहते हैं

कि मैं लक्ष्य को पा जाऊं

भय है केवल इतना कि

पाषाण ह्रदय ना बन जाऊं।

-आरती मानेकर

तुम्हारी प्रतिक्षा में!!!

अलमारी के ऊपरी खाने में रखी

वो सुनहरी जिल्द वाली

तुम्हारी और मेरी बातों की

किताब कहीं गुम हो चुकी है।

शायद दुनियादारी की अगणित किताबों के बीच

दब गई हो!

लुका – छुपी के खेल में

दरवाजे के परदे के पीछे

तुम छिपते थे।

वहां अब केवल तुम्हारा अहसास

रज बनकर बाकी है।

कमरे की दीवार पर लगी

हमारी तस्वीरों की चौखटें

कुछ टूट गईं हैं और

गिरने लगी हैं तस्वीरें

कीलों के निकल जाने से!!

आंगन में लगे उस पेड़ के झूले की

रस्सियां भी झूलस गईं हैं…

अब नहीं सहती वो भार मेरा;

जो सह लेती थीं,

तुमको और मुझको

एक समेत!!!

और मेरा बचपन

अंगड़ाइयां नहीं लेता अब

मां की गोद में!

जो तुमसे लड़ने पर

सो जाया करता था।

चीजें बदल तो गईं हैं

मित्र! तुम्हारे जाने से…

तुम्हारा शहर विस्तृत हो चला

और सिमटता गया 

मेरे गांव का दायरा

तुम्हारी प्रतिक्षा में!!!

-आरती मानेकर

Call Me Back…!

One year passed,
                 I am far from you.
I miss you everyday,
                 Indeed, it’s true.
Everyday in morning,
                 I wait for your call.
Don’t you miss me?
                Want to ask, your doll.
In a day, every hour
                I check my mobile.
Hence my day pass,
                But my heart immobile.
The load of your memories,
                Now I learnt to bear.
At night, the world sleeps
               And I, burst in tear(s).
I’m surrounded by crowd
               But, my soul is alone.
Do you feel the same?
              Or have you been a stone?
Now, I want to repent,
             On the mistake I’ve done.
Forgive me, O my lord!
             Else my entity will be none.
I want your love
             And I need the same care.
Listen to my silence,
             My words don’t have dare.
In this world, without you
             I can’t really walk.
Oh my dear MOM-DAD,
             Please, call me back…!

-Arti Manekar