​मैं शिक्षक हूँ

तुम नन्हें-से पहली दफा जब मुझसे मिले थे
तुम्हारी जिज्ञासाओं को अंगीकार किया मैंने,

विविध विषयों से मिलाया तुमको, उसपर तुम्हारे

अल्पज्ञान को भी स्वीकार किया मैंने,

कितनी सारी मिथ्या कल्पनाएँ थीं तुम्हारी,

मन के अंधकार को दूर किया मैंने,

तुम यों ना पूजो मुझे, ना मुझे ईश बनाओ!

नहीं कोई चमत्कार किया मैंने!

मैं अज्ञानता का भक्षक हूँ।

मैं तो बस एक शिक्षक हूँ।
तुम्हारी किसी शरारत या गलती पर

मैंने बेंत कभी मारी होगी।

कभी कटु शब्दों से तुमको मैंने,

जमकर फटकार लगाई होगी।

घाव खूब दिए होंगे तन-मन पर,

नींद तुमको उस रोज ना आई होगी।

मन-ही-मन मुझको शत्रु माना होगा तुमने,

सोचो, मेरी छड़ी भी तो रोई होगी!

किन्तु मैं शुभकामनाओं का प्रेषक हूँ।

मैं केवल एक शिक्षक हूँ।
तुमको पढ़ाने को मैंने किया रतजगा कभी,

कभी दिन को मैंने शाम किया।

तुम बने चिकित्सक, अभियांत्रिक; की वकालत,

मैंने सबके हिस्से का काम किया।

तुम जब अपनी सफलता की खुशी लाए,

मैंने केवल उस पल आराम किया।

मैंने अपना जीवन तो केवल तुम्हारे और 

शिक्षा के नाम किया।

तुम्हारे स्वर्णिम भविष्य का रक्षक हूँ।

हाँ, मैं ही शिक्षक हूँ।
चाह नहीं है यह मेरी कि तुम

मुझको हर बार नमस्कार करो।

भूख यह भी नहीं कि इस दिन तुम,

मेरा उपहारों से सत्कार करो।

मैं नहीं कहता कि तुम आजीवन मुझसे

मिश्री-सा मीठा व्यवहार करो।

किन्तु नहीं है यह भी कहना मेरा कि

मेरे ज्ञान का तुम तिरस्कार करो!

केवल सुखद परिणामों का भिक्षुक हूँ।

हाँ, हाँ मैं ही शिक्षक हूँ।

-आरती मानेकर

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं…

इस कविता को मेरी आवाज में सुनना ना भूले….

https://youtu.be/h4g6-cmp9rc

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