खेल

चलो मित्रों!

एक खेलें खेल!

ना मैं जीतूं,

ना तुम हारो,

बस दिल जीते

और हारे दिन।

हम गीतों की रेल बनाएं,

अंत अक्षर से

गीत अगला गाएं,

कुछ गीत पुराने

तुम गाना,

कुछ नए तराने

मैं सुनाऊँ।

प्रभु प्रार्थना से प्रारम्भ,

भक्ति में डूबे सब जन,

अश्रु बहेंगे;

एक गीत गुनना,

होगी हंसी – ठिठौली,

दूजे गीत के संग,

तीजे में तुम

हमें नाच दिखाना,

चौथे में थिरकेंगे

सबके कदम।

गाओ क्रमवार,

लगातार चढ़ने दो

खेल का रंग,

अंत ना करना

चाहे रात बढ़ेगी,

हम खेलें खेल

चाहे दिन हो मलंग।

यह खेल दिल मिलाएं,

नई यादें बनाएं,

कभी किसी को हंसाएं,

कभी किसी को रुलाएं।

चलो मित्रों!

एक खेलें खेल!

कोई जो एक गीत गाएं,

भूले जो वो तो,

सब संग में सुर मिलाएं,

यह दिलों से बैर मिटाएं।

-आरती मानेकर

Advertisements

नज़र का असर

उस दिन अजनबी से मिली जो नज़र,

नज़र ही नज़र में कुछ बातें हुईं।

लबों ने कहा न कुछ भी मगर,

नज़र ने नज़र से कुछ बातें कही।

अजनबी ही सही; वो तो कहता गया,

हम भी सुनते रहे अपनों की तरह।

खूबसूरत हूँ मैं हुआ ये यक़ीन,

उसकी नजरों ने एक राज़ ऐसा कहा।

हटी जो नज़र उसकी नजरों से फिर,

दिल ने पूछा हमें ये क्या बात हुई?

बड़ी शिद्दत है नज़र में उसकी शायद,

दिल ने कहा, उतर डूब जाने को सही।

सुन ली बात यही, रखा हमने कदम,

अब ना खुद की ख़बर, दुनिया दूर रही।

दुनिया ने कहा, तू सम्भल जा जरा,

दिल ये सुनता कहाँ, दिल ये डरता नहीं।

अजनबी की नज़र ने किया ये असर,

दिल अब पल – पल उसकी बातें करें।

मोहब्बत में क्यों दिल बेक़ाबू हुआ?

मोहब्बत की पहल तो नज़रें ही करें।

-आरती मानकर

नव क्रांति

शब्दों को हम आग बनाकर

और कलम को तलवार बनाकर,

नव क्रांति को हो तैयार,

चलो कूद पड़े रण में हम – तुम।

किन्तु ना रक्तपात ही होगा,

ना नरसंहार ही होने पाएं।

हाँ, हम भीषण वार करेंगे

और शत्रु का नाश करेंगे,

मन का कलंक ताकि धूल जाएं।

लोभ, दम्भ और बेईमानी;

क्रोध, हिंसा, असूया

और मानव का मन कषाय,

ये ही हैं शत्रु हमारे।

चलो मिलकर इनका सर्वनाश करें,

कि हम फिर इंसान बन पाएं।

तुम वाग् – बाण से घायल करना,

मैं जज़्बातों का पाठ पढ़ाऊँ,

परिवर्तन को लक्ष्य बनाकर,

इस युद्ध का हम बीड़ा उठाएं।

अवश्य जीतेंगे हम और तुम,

जीत का जो हम प्रण करें

जीत के बाद सुख ही होगा

और संसार योग्य बन जाएं।

-आरती मानेकर

अर्पण

तुम एक शाश्वत सत्य हो,

एक स्वप्न मैं नश्वर – सा।

तुम गंभीर यथा जलधि हो,

मैं चंचल सरिता – सा।।

तुम प्रभात का सूर्य बन जाना,

बनूँ मैं सन्ध्या की स्तब्धता।

दीपक बन तुम तम हर लेना,

करूँ बाती बन मैं सहायता।।

दूर क्षितिज पर सदन तुम्हारा,

मैं थका पथिक पगडंडी का।

प्रेम की तुम हो अविरल धारा,

अवलंब मेरी तृष्णा का।।

निशा का तुम जो चन्द्र बनो,

मैं भी निशा के अंचल का तारा।

तुम आराध्य मेरे उर का बनो,

अर्पण कर दूँ मैं जीवन सारा।।

-आरती मानेकर

काली कमाई…😂

हमारे प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी द्वारा लिए गए आज के इस ऐतिहासिक फैसले की वजह से काले धन वाले किसी व्यक्ति की मनोदशा कैसी है, उसी की दृष्टि में व्यंग्य रूप से इस कविता के माध्यम से देखते हैं:

मुझको उपकारी बनाने की,
                        हे मोदी! तुमको क्या सूझी?

सच कहता हूँ कल रात

                        मेरे घर की बत्ती नहीं बुझी।

पूरी जिंदगी बिता दी मैंने

                        धन इतना बनाने में।

आज लूटा रहा हूँ पैसा मैं;

                        मंदिर, मस्जिद, मयख़ाने में।

आज सवेरे मन्दिर जाकर मैंने

                       जो लक्ष दान की थी ठानी।

“रख काली कमाई जेब में तू”

                       कह रही थी भगवन की वाणी।

मन्दिर के बाहर दीन था, मैं बोला,

                      “तू मांग, आज मेरा धन ले ले”।

वो बोला, “न नोट हजारों के,

                        तू केवल मुझे दुआएँ दें”।

घर आकर के चूल्हे में मैंने

                        थी नोटों से आग जलाई।

तन की ठण्ड तो मिट गई,

                       भस्म हुई मेरी काली कमाई।

कल तक धनवान बना फिरता मैं,

                       एक रात में कंगाल बना डाला।

मैं तो सोया नहीं सारी रात मगर,

                       मीठी नींद सोया होगा हर ग्वाला।

स्वच्छ भारत का वो सपना,

                        मानो अब साकार हो रहा।

जो पड़ा हुआ था तिजोरी में,

                        वो धन काला साफ हो रहा।

एक दिन काले रुपये सारे,

                        जब गंगा में बह जाएंगे।

मोदी तेरी नीति से फिर

                        अच्छे दिन आ जाएंगे।

-आरती मानेकर

सुनो ओ प्रियतम…

सुनो ओ प्रियतम…

मैं सजी बन दुल्हन…

मैंने तुमको दामन में सजाया

और तुम बनकर अभिमान मेरा

चमक रहे जैसे,

मेरे माथे की बिंदिया चमचम…

सुनो ओ प्रियतम…

मेरे काजल में दृष्टि तुम्हारी

और अथरों पर लज्जा की लाली,

नथनी का नग दमके,

यथा आसमान का चन्द्र बन कुंदन…

सुनो ओ प्रियतम..

लिखा करतल पर नाम तुम्हारा,

वक्ष पर हँसती मुक्ता की माला,

बातें तुम्हारी खनक रही,

बनकर मेरे कंगन की खनखन…

सुनो ओ प्रियतम…

करधनी हुई जैसे तेरी बाहें,

प्रेम तेरा गजरा बन महके,

चुमे कपोलों को बाली

और अनामिका में तेरा बन्धन…

सुनो ओ प्रियतम…

अंगराग से देह महकती

और पल-पल मैं अधिक बहकती,

उत्सुकता तेरी बढ़ा दे,

चंचल मेरी नूपुर की छनछन…

सुनो ओ प्रियतम…
लाज के घूँघट में बैठी मैं,

मन खिला जैसे वृन्दावन,

कंचन हुई देह,

और तुम हुए मेरे हृदय का दर्पण…

सुनो ओ प्रियतम…
-आरती मानेकर

खोखले रिश्तें

खोखले रिश्तें,

मानवता से परे,

केवल रस्में निभाते हैं,

किन्तु प्रेम नहीं!

यों तो संसार के सामने

एकता दिखाते हैं,

किन्तु चारदीवारी में बैरी,

रंच भी प्रेम नहीं!

दूर तक भी रहकर

चाय की महक पहुंचती,

पास आते ही रोटी जलती,

स्वाद और प्रेम नहीं!

एक तेरा-मेरा रिश्ता, हरि!

अलौकिक, संसार से परे,

मुझे आसरा तेरे दर्श का,

केवल है प्रेम यहीं!!!

-आरती मानेकर