देह में मरती-सी मैं!

हाँ, हँसी कुछ बनावटी-सी मैं,
अंदर थी कुछ-कुछ टूटी-सी मैं।
गुनाह मैंने भरपूर किए थे,
शायद उन्हें ही छुपाती-सी मैं!

मैं चलती, राह से सौदा करती,
कंकड़-पत्थर की फिरौती-सी मैं।
बेघर थी, एक घर होकर भी,
हर कहीं पनाह ढूँढ़ती-सी मैं!

ख़ुश हूँ, सूरज मुझसे मिला है,
फसल धान की लहराती-सी मैं।
अब रानी बनकर राज करूँ मैं,
थी तवायफ़ बन कभी सजती-सी मैं!

मैं बंजर-उपजाऊ, सोना भी उगलूँ,
शस्य-श्यामल, इसी धरती-सी मैं।
मैं मोम हूँ, या हूँ दावानल ही,
अपनी ही आग में जलती-सी मैं!

मैं कठीन पहेली, सरल उत्तर हूँ,
ख़ुद ही उलझती, सुलझती-सी मैं।
छुपे हैं कई राज, बाहर ना आए,
उस खाली-गुमनाम बस्ती-सी मैं!

रेत हूँ शायद, पकड़ ना पाओ,
हाथों से तुम्हारे फिसलती-सी मैं।
हाँ शायद मैं ही तो जिंदगी हूँ,
हर दिन, दिन-दिन घटती-सी मैं!

फूल नहीं मैं, नाज़ुक पंखुड़ी हूँ,
खिलती नहीं अब, बिखरती-सी मैं।
मुझसे मिलोगे तो भ्रम ही होगा,
जीवित हूँ या देह में मरती-सी मैं!
-आरती मानेकर

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अजीब ही बदलाव देखा है…

मैंने देखी है तेरी मोहब्बत और तेरा ताव देखा है,
तेरी हँसती हुईं आँखें और दिल का हर घाव देखा है।

पाई तक ना लुटाए कोई , तू ख़ुद ही लूट जाए,
देखे हैं पैसेवाले ख़ूब, तुझ-सा न कोई राव देखा है।

कल आबाद थीं, आज सुनसान हैं, गलियाँ शहर की,
क्या मेरे अलावा भी किसी ने ये पथराव देखा है?

नफ़रत देखी है मैंने इस दहर के हर शहर में,
तुझमें! सिर्फ तुझमें, मोहब्बत का गाँव देखा है।

मैं अब तलक चलती रही, चलती रही और थक गई,
जहाँ पा लेती हूँ सुकून, तेरी गोद में वो ठाँव देखा है।

तू रूठा ना कर, मैं बुज़दिल बहुत हूँ,
मैंने तेरे बिना अपनी जिंदगी में ठहराव देखा है।

नाज़ुक हूँ मैं ही, फ़क़त तू कमजोर ना बन!
हर किसी ने काँच और पत्थर में टकराव देखा है।

तप रहा मेरा बदन था, सर्दी नहीं कम थी, ऐसे में
मैंने कल रात रजाई से बाहर तेरा पाँव देखा है।

एक दिन में सयानी हुई, कल नींद नहीं आई,
नादानी से अपनी ही, वक़्त-ए-अलगाव देखा है।

आज न कोई हँसी, न कोई आँसू ही नजर आया,
तेरे बर्ताव में मैंने ये अजीब ही बदलाव देखा है।

-आरती मानेकर