चावल का दाना

अक्षत, अक्षय, अखण्ड, अनाज वह

देवों को अर्पित होता है,

वही बन के रोली रक्षाबंधन पर

भाई के माथे पर सुहाता है।

उत्सर्ग के क्षण बनके धान वह,

धरती के सीने पर लहराता है।

चार दाने चावल ही कभी

शुभकार्यों का निमंत्रण बन जाता है।

माँ की रसोई में खुशबू बिखेर,

पिताजी की थाली में खिलखिलाता है।

भाभी की पहली रसोई के दिन

खीर का स्वाद बढ़ाता है,

अन्य अनाजों के संग सांझा कर

कितने ही पकवान बनाता है।

देर रात काम से लौटे बेटे के
उदर का आधार बन जाता है।

 पुण्यवचन के चावल का दाना,

किसी का उपवास पूरा करवाता है।

फिर क्यों विवाह के सुक्षणों में

पैरों के नीचे रौंदा जाता है?

व्यर्थ अनाज का यह परिमाण

दीनों की क्षुधा नहीं मिटाता है!

और देखो हमारे ‘सभ्य’ समाज को

बेकार परंपराओं पर इतराता है!

मंगलाष्टक के क्षण, अक्षत का स्थान

पुष्प-दल भी तो ले सकता है;

सच है, नई सोच को अपनाकर ही

परिवर्तन लाया जा सकता है!

-आरती मानेकर

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रांगोळी

पूर्व दिशेला सूर्य उगे,
झाली सुंदर सकाळ.
गृहलक्ष्मी! करती काय?
सडासंमार्जन करे अंगणी
त्यावर,
दोन बोटांच्या चिमटीने,
रेखीली रांगोळी.
अनेक बिंदु
जोड़ती रेष
कधी सरळ आणि
वक्र रेष कधी.
फूल-पाणे,
सूर्य-चंद्र कधी
स्वस्तिक आणि
कळश-शंख कधी,
अशी काढ़े
विविध आकार.
लाल-हिरवा
पिवळा- निळा
रंगाचा सुंदर संस्कार.!
अशी सजती
रांगोळी अंगणात
आणि शोभा वाढ़े घराची.
दिवाळी असो
असो किंवा दसरा
संक्रांतीचा
असा दिवस हसरा,
तरी सजती
रांगोळी अंगणात.
गृहसौंदर्याचा प्रतीक
तसाच शुभकार्यचा मान,
मन होई प्रसन्न,
अशी सजती
रांगोळी अंगणात.

-आरती मानेकर

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