लांछन

आह! कितना आनंदित जीवन था, जब तुम और मैं सूक्ष्म प्रेम के सूत्र में बंधे हुए थे। हर प्रभात में सूर्य की किरणें प्रेम का नया पर्याय ले आती थीं और सारा दिन उस प्रेम के पर्याय के बारे में विचार करके व्यतीत हो जाता था। हम – तुम रोज बात ना कर पाते थे, किंतु एक – दूसरे की मधुर स्मृतियाँ हमारे हृदयों को अगाध प्रेम से भर देती थीं। जानते हो, उन दिनों मेरी सखियाँ मेरी चुटकी लेती थीं कि प्रेम – प्राप्ति के पश्चात् मेरा चित्त और मेरा मुख दोनों ही पहले से अधिक प्रफुल्लित थे। मेरे तन में प्रत्येक क्षण एक अद्भुत स्फूर्ति – सी रगों का लहू बनकर दौड़ती थी और हृदय तक पहुंचकर तुम्हारे प्रेम की स्मृति कराती थी। याद है तुम्हें वह दिन, जब तुमने मेरी सखियों के समक्ष अपने प्रेमोद्गार को मुझसे प्रकट किया था। आह! लज्जा से मुख की लाली और इस अलौकिक आनन्द से हृदय का आयतन, दोनों ही क्षण – क्षण बढ़ते ही जाते थे। तुम्हारे प्रेम को अपने हृदय की अनुमति देकर मैंने स्वयं को भाग्यशाली माना था। तुम्हारी वह प्रेम मूर्ति मेरे नयनों में इस प्रकार छपी थी कि मैंने तुम्हारा चित्र भी बना लिया था। उन दिनों एक – दूसरे के प्रति कितना आदर था न! और हमारे प्रेम का विश्वास अपने चरम पर पहुंच चुका था। यह धरती और वह आकाश दोनों ही हमारे प्रेम के शाश्वत साक्षी थे। जीवन का प्रत्येक क्षण प्रेममय था। संगीत के मधुर स्वरों और गीली मिट्टी की सुरभि की भाँति तुम्हारा प्रेम मेरे हृदय को अतुलित आनन्द देता था।

किन्तु, आज! आज तुमने अपने मिथ्या प्रेम का कटु; किन्तु सत्य अनुभव कराकर मुझे स्वप्नों के अनन्त आकाश से लाकर वास्तविकता की धरती पर खड़ा कर दिया। मैं तुम्हें आज से पहले तक निष्काम प्रेम का देवता समझती थी और उसी निष्काम प्रेम से आराधक बन कर तुम्हारी भक्ति करती थी, किन्तु तुम तो कामुकता के दैत्य निकले। तुम्हारे प्रेम का जो भ्रम मेरे हृदय को हुआ था, वह आज टूट चुका है। मेरा प्रेम भौतिकता से परे असीम था, किन्तु तुम्हारा प्रेम शारीरिक सम्बंधों तक सीमित!

हाँ, मैं तुम्हारी होना चाहती थी, पूर्ण रूप से तुमको समर्पित होना चाहती थी, किंतु बिना सर्वसम्मति के अपने सूक्ष्म अलौकिक प्रेम को स्थूल लौकिक प्रेम में परिणित करना; मेरे प्रेम का आदर्श ना था। मेरे प्रेम का आदर्श तो तुम्हारी प्रेमपूर्ण सेवा करना था, सम – विषम परिस्थितियों में तुम्हारे साथ होना था, किन्तु तुम शायद इस बात को समझ ना पाए और इसलिए प्रगाढ़ होने के तुम्हारे व्यर्थ अनुनय को मेरे अस्वीकार किए जाने पर तुमने उस प्रेम के कोमल और पवित्र सूत्र को तोड़ दिया। आह! कितना कमजोर प्रेम था तुम्हारा और कितना सीमित! प्रेम कलम की स्याही नहीं है, जो उपयोग के बाद समाप्त हो जाए, प्रेम तो अथाह समुद्र का अनन्त जल है, जो अनन्त काल तक बना रहे! किन्तु तुम इस संज्ञा को कहाँ समझ पाए! वास्तव में तुमने प्रेम न किया था, तुमने तो प्रेम को केवल अपनी काम – साधना का आधार बनाया था। तुम्हारे प्रेम के अभिनय में कितनी सजीवता थी, कि मैं सहज ही इस मिथ्या अभिनय को अपने जीवन का शाश्वत सत्य समझ बैठी थी। दुष्ट हो तुम! बहुत दुष्ट हो, मेरे फैले हुए हृदय को एक क्षण में मुरझा दिया, मेरे प्रफुल्लित जीवन को एक क्षण में ही रुला दिया। नहीं! तुम दुष्ट नहीं, मेरा प्रेम इतना तुच्छ नहीं हो सकता। दुष्ट तो मेरा हृदय था, जो तुम्हारे प्रेमार्थ को ना समझ पाया। 

मैं तुम्हारे प्रेम बन्धन में सूक्ष्म रूप से बंधना चाहती थी, स्थूल रूप से नहीं! भौतिक रूप से बंधने के लिए मुझे थोड़ा अवकाश तो दिया होता। तुम अगर मुझसे रूठे होते, तो मैं तुमको मना लेती, किन्तु तुमने प्रेमांत करके मुझसे यह अवसर भी छिन लिया। ना! अब मैं तुमपर कोई लांछन नहीं लगा सकती। तुम्हारा प्रेम तो मेरे प्रति समाप्त हुआ, किन्तु तुम अनन्त काल तक मेरे लिए प्रेम मूरत बने रहोंगे। तुम्हारा सीमित प्रेम आज धरा की भाँति सीमित रह गया, किन्तु मेरा असीम प्रेम अब आकाश से भी अनन्त होगा, आजीवन!
आरती मानेकर

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Shhhhh……

मैं सो रही थी, रात के ठीक 12 बजे मेरा mobile बजा और मेरी नींद टूटी। इससे पहले कि मैं phone उठाती, phone बजना बन्द हो चुका था। जब mobile check किया तो पाया कि किसी unknown number से call था। मैंने call back किया, लेकिन वो number switch off था। इतने में मेरे घर के main door की bell बजी। मैं डर गई, फिर से bell बजी और बार-बार बज रही थी। मैं हिम्मत करके अपने रूम से बाहर गई, सीढ़ियों से नीचे उतरी और धीरे से घर का दरवाजा खोला, और मेरी बंद आँखें भी, जो डर की वजह से बन्द हो गई थीं। आँखें खुलते ही मैंने देखा कि दरवाजे पर कोई नहीं था। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, घर के landline पर किसी का phone था। मैंने झट से दरवाजा बन्द किया और phone उठाने बढ़ी, लेकिन जब तक मैं phone के पास पहुंची, landline भी बजना बन्द हो चुका था। अब मैं कुछ ज्यादा ही डर गई थी। डर से मेरा गला सुख चुका था और पसीना मेरे माथे से टपक रहा था। मैं पानी लेने kitchen की ओर बढ़ी।पानी पिया, थोड़ी राहत महसूस हुई, खुद को सम्भाला और मैं वापस अपने कमरे की ओर बढ़ी। कुछ सीढ़ियाँ चढ़ते ही मुझे मेरे कमरे से हँसने की आवाज आने लगी। मैं और ऊपर चढ़ी और lights बन्द हो गईं, लेकिन हँसने की आवाज अभी भी आ रही थी। मेरे हाथ में मेरा mobile था तो मैंने उसका torch on किया और अपने कमरे की ओर बढ़ी। कमरे का दरवाजा बन्द था, जबकि मैं उसे खुला छोड़ गई थी। अब वो हँसी बन्द हो चुकी थी। धीरे-धीरे दरवाजा अपने आप ही खुल गया। मेरे हाथ से mobile गिर गया और उसका torch बन्द हो गया। मैंने mobile उठाया और जैसे ही कमरे में कदम रखा, HAPPY BIRTHDAY TO YOU की आवाज के साथ ही कमरे की light चालू हुई और मैंने देखा कि मोहित, रूपल, रिद्धिमा, ओजस और मेघ सब मेरे कमरे में थे और एक बहुत ही खूबसूरत cake लाया था उन्होंने। अब मेरे चेहरे पर थोड़ा डर और थोड़ी मुस्कुराहट थी और साथ ही आँखों में डर के आँसू…
मैं तो भूल ही गई थी कि आज मेरा birthday है और इस बात से चकित भी थी कि कोई मुझे इस तरह से wish भी कर सकता है।

” पल्लवी, chill dear और अब आओ cake cut करें, wish u a very happy birthday…” मेरे चहरे के डर को पढ़कर मेघ ने उसे दूर करने की कोशिश की..।

“यार, तुम सब, इस तरह से ये सब.. omg, मैं तो पूरी तरह से डर गई थी!” मैंने कहा।

“अब तो ठीक हो न पल्लू? चलो अब cake cut करो जल्दी…. I’m excited..😍” रिद्धिमा बोली।

मोहित ने मेरे हाथ में चाकू दिया और मैंने cake काँटा। और सबने फिर से एक बार मुझे wish किया। रूपल ने तो मेरे चेहरे पर cake लगा कर मुझे भूत ही बना दिया था। हम सबने बहुत enjoy किया। 

“चलो सब लोग.. कल अनीता की सगाई में भी जाना है न..😍 मुझे shopping भी करनी है!” रूपल बोली।

“मेरा वहां आने का बिल्कुल मन नहीं है, mummy-papa से सुना था उस जगह के बारे में कि कईं सालों पहले आपसी झगड़े के चलते किसी ने रात को उस घर में आग लगा दी थी, जिसमें घर के सारे लोग जलकर मर गए। कहते हैं आज भी उनकी आत्मा वहाँ घूमती है। पता नहीं अनीता के papa ने वो farmhouse कैसे खरीद लिया।” मैंने लम्बी सांस भरते हुए कहा।

“पल्लू, क्या तुम भी.. आत्मा और वो भी आज के जमाने में.. कोई बहाना नहीं चलेगा.. तुम्हें आना होगा हमारे साथ.. मैं कल लेने आ जाऊंगा। ” मोहित बोला।

“और अगर किसी आत्मा ने तुमको पकड़ लिया, तो हम दोस्त कब आएंगे काम..😉 बचा लेंगे तुमको” मेघ मुझे चिढ़ाते हुए बोला।

मुझे हां कहना पड़ा और एक बार फिर मुझे wish करने के बाद सब अपने घर के लिए निकल गए। मैं घर का main door बन्द करके अपने कमरे में गई और कल के बारे में सोचते-सोचते मुझे कब नींद आ गई, पता भी नहीं चला।
अगले दिन सुबह मेरी नींद mummy-papa के call से ही टूटी। 

“happy birthday बच्चा” mummy-papa ने एक साथ wish किया।

“thankyou mum-dad.. कैसे हो आप? कब आ रहे हो.. मुझे बहुत याद आ रही आपकी.. और हा आज मुझे अनीता की सगाई में जाना है… कल रात को रिद्धिमा, रूपल, मेघ और मोहित आए थे.. मैंने मना भी किया था, but वो लोग नहीं माने…तो मुझे हा बोलना पड़ा … mum…”

“बेटा बस…बस…जरा धीरे… एक साथ इतना सब.. जरा सांस तो लो…”

“oops, sorry mum, आपसे नहीं मिली न एक हफ्ते से तो सब बोल दिया एक साथ.. जल्दी आओ न..”

“हा बेटा, हम परसो घर पहुंच जाएंगे.. ध्यान रखो अपना.. और वो क्या कह रही थी तुम.. अनीता की सगाई? बेटा वो तो उनके farm house में है न..?”

“हां”

“तुमसे कहा था न वहाँ नहीं जाना…”

“पर dad..अनीता की सगाई है न.. और सारे frnds भी force कर रहे हैं.. ”

” जाने दो न उसे.. उसकी frnd की सगाई है.” mum, papa से बोली।

“okay, ठीक है.. लेकिन ध्यान रखना बेटा अपना..”

“thank you papa and mumma… love you both..”

“love you too बेटा..चलो.. bye…”

“bye..”  इतना कहकर phone रखा और मैं अपने कामों में लग गई।  

शाम हो गई.. मैं तैयार हो रही थी.. मेरा सारा दिन तो बस उस घर और जलाकर मारे गए लोगों के बारे में सोचते हुए बिता। लेकिन अभी भी वही विचार मेरा पीछा नहीं छोड़ रहे थे..। 

इतने में मेरे विचारों के बाँध को तोड़ती हुई मोहित की गाड़ी आ कर मेरे घर के सामने खड़ी हुई..। उसने horn दिया, मैंने खिड़की से अंदर आने का इशारा किया.. मेघ, मोहित, रूपल, ओजस और रिद्धिमा सब hall में बैठे मेरा wait कर रहे थे। मैं तैयार होकर नीचे आ रही थी कि मेरे पैर में अचानक मोच आ गई और मैं सीढ़ियों पर ही बैठ गई.. सब दौड़ते हुए मेरे पास आए, रिद्धिमा ने मेरे कमरे से spray लाया और मेरे पैरों पर लगाया। अब पैर ठीक था, लेकिन ऐसा लग रहा था कि कोई मुझे वहां जाने से रोक रहा है। 

“ठीक हो न पल्लू” ओजस बोला।

मैंने हा में सिर हिलाया और खड़ी हो गई।

“चलो, काफी देर हो चुकी है… late हुए तो अनीता को बुरा लगेगा..” मोहित बोला।

और हम सब जाकर गाड़ी में बैठ गए। मोहित driving कर रहा था और मेघ उसकी बगल वाली seat पर बैठा था और हम सब पीछे। काफी कोशिश के बाद भी मोहित गाड़ी start नहीं कर पाया।

“क्या हुआ मोहित?” मेघ बोला।

“पता नहीं क्या हुआ है, सब तो ठीक है, लेकिन गाड़ी start नहीं हो रही।”

“girls, जरा उतरना गाड़ी से” मेघ चिढ़ाते हुए बोला।

सबसे पहले मैं उतरी और मेरे उतरते ही गाड़ी start हुई। मुझे फिर एहसास हुआ कि कोई मुझे वहाँ जाने से रोक रहा है, लेकिन किसी से कुछ नहीं कहा मैंने।

“लगता है पल्लवी पहले से ही बहुत सारा खा कर आई है, वहां क्या खाओगी पल्लू..?” सब मुझे चिढ़ाते हुए बोले।

मैं गाड़ी में बैठी और हम सब चल पड़े। रास्ता काफ़ी लम्बा था, venue शहर से बाहर था। मैं पहले भी कई बार इस रास्ते से आ-जा चुकी थी,लेकिन आज यह रास्ता बड़ा ही अजीब और डरावना लग रहा था।आज एक भी pole पर light नहीं जली थी और अचानक से रास्ते पर के पेड़ भी बहुत बड़े लग रहे थें। सब कुछ अजीब था।  सब लोग बातें कर रहे थे लेकिन ना जाने क्यों मेरा मन अब भी डरा हुआ था। अचानक से गाड़ी रुकी और धक्का लगने से मैं फिर ख्यालों से बाहर आई। हम सबने एक साथ मोहित से पूछा “क्या हुआ?”

उसने सामने इशारा किया। हमने देखा एक छोटी सी लड़की अपनी गुड़िया के साथ खेल रही थी, वो भी बीच रास्ते, उसके आस-पास कोई नहीं था। रास्ते पर चारों ओर सिर्फ और सिर्फ अंधेरा ही था।

हम सब गाड़ी से उतरें और जैसे ही बच्ची की तरफ बढ़े तो देखा कि वहाँ कोई नहीं था। हम सब थोड़ा डर गए.. पीछे से कुछ आवाज आईं, वो हम सबने पलटकर देखा और पाया कि वही बच्ची किसी औरत के साथ जा रही थी। शायद वह उसकी माँ थी। सबने राहत की सांस ली और फिर गाड़ी में बैठे और गाड़ी चल पड़ी। इस बार चर्चा का विषय वही बच्ची थी।

हम थोड़ा आगे बढ़े, अचानक मेघ, जो मोहित के बगल वाली seat पर बैठा था,  ने देखा कि एक पेड़ हमारे रास्ते में गिरने वाला है। मोहित ने गाड़ी fast की और इससे पहले की वो पेड़ गिरे हम लोग वहां से निकल गए और हम बच गए। अब कोई भी समझ नहीं पा रहा था कि क्या हो रहा है। मैंने वापस चलने को कहा , लेकिन कोई नहीं माना।और मोहित ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। अचानक मौसम भी ख़राब हो गया, हवाएँ तेज हो गई, शायद बारिश होने वाली थी। और party venue के पास पहुंचते -पहुंचते हमारी गाड़ी भी puncture हो गई। 

“damn..! ये गाड़ी को भी अभी खराब होना था..” मोहित चिढ़ के बोला।

“मोहित, यहीं तो पास में है venue.. हम पैदल भी जा सकते हैं।” रूपल उसे शांत करते हुए बोली।

हम अब पैदल ही चलने लगे.. रास्ता अचानक से लम्बा लगने लगा। जैसे-तैसे हम वहां पहुंचे और हमने देखा कि पूरा घर जल रहा है… और शायद घर के अंदर भी कोई था.. लोगों की बातें सुनाईं दी।

“पता नहीं यहां आग कैसे लग गई! ये सब भैया की ही करनी का फल है.. 20 साल पहले उन्होंने इसी जगह को ऐसे ही जलाया था बिना किसी की परवाह किए..और आज वो खुद ही जल रहे हैं..” रोते हुए किसी ने बोला।

थोड़ा पता करने पर पाया कि वो सुधीर(अनीता का मंगेतर) के चाचा थे और जो घर के अंदर जल रहे थे वो सुधीर के papa….

इस आग को देखकर मुझे बहुत कुछ याद आ रहा था, मैं पूरी तरह से डर चुकी थी, ऐसा लग रहा था जैसे ये सब पहले भी कभी मेरे साथ हो चुका है.. वही जगह, वही घर, वही आग और उसी तरह से रोती हुई मैं… बस बदला था तो अंदर जलता हुआ इंसान…सब कुछ सपने की तरह मेरे सामने खड़ा था.. कुछ समझ नहीं आ रहा था.. मेरे बाकी frnds अनीता और उसकी family को दिलासा दे रहे थे…

अब बारिश भी होने लगी थी, लेकिन आग उसी तरह जल रही थी और घर के  अंदर से आने वाली आवाजों ने सबको दहशत में डाल दिया था।

इतने में मेरे parents, जो कि परसो आने वाले थे, वहां आ पहुंचे.. मुझे देखते ही उन्होंने मुझे संभाला..

“papa, ऐसा लग रहा है कि ये सब मेरे साथ पहले भी हो चुका है..!” मैं papa से लिपट गई और रोते हुए बोली।

“हां, बेटा, ये तुम्हारा ही घर था। आज इसके अंदर जो इंसाल जल रहा है, उसी ने 20 साल पहले तुम्हारे माँ-पिताजी और भाई को इसी घर नें जलता हुआ छोड़ दिया था… बस तुम मेरे पास थी, और तुम बच गई..” papa ने भी रुआंसी आवाज में कहा…।

मैं रोती हुई उस जलते हुए घर को देख रही थी और उस आग में जलते हुए मैं अपने भाई और maa-papa को देख पा रही थी…..

-आरती मानेकर