कलाकार से प्रतिशोध…

क्या तुम्हें हमसे घृणा है?
या तुम्हारे जीवन में हमारी उपस्थिति मना है?
क्या हमने दुःख कोई दिया है तुम्हें?
कहीं शत्रु तो नहीं मानते हो तुम हमें?
कहीं रावण बनकर, तुमसे सीता-सी पवित्र कोई वस्तु हरण की हो हमने!
या कारण हम बनें हैं और कष्ट झेलें हो कई तुमने!
या मध्यस्थ बनकर बीच में, तुम्हारे और सरकार का,
हनन किया हो हमने तुम्हारे किसी अधिकार का!
क्या कोई प्रतिशोध लेना चाहते हो तुम हमसे?
या कामना की हो तुमने हमारी मृत्यु की भगवान से?

तो सुनो! हम तुम्हें एक रहस्य बताते हैं
और इस रहस्य का परिणाम वीभत्स बताते हैं-
मार डालो तुम सबसे पहले हमारे अंदर के कलाकार को
और फिर टूटता देखो तुम अपने संसार को।

ये कठीन होगा थोड़ा, कि कलाकार मनुष्य कहाँ होते हैं,
दुःख जहाँ पर करते हो घर, हाँ ये कलाकार केवल वहाँ होते हैं!
बड़े काम का दुःख है इनका, ये नहीं निकम्मा होता है।
आप रोकर भी संसार को खुशी देना, इनका ही जिम्मा होता है।
ये अपनी लेखनी की स्याही से दुनिया का रंग बदलते हैं।
हाँ, इसी कारण से शायद ये तुम्हारे मन को भी खलते हैं।

तो करो कुछ इस तरह तुम, कि इनका अंश भी मिटा डालो,
हो जिस मन पर भी वश इनका, उस वेश को ही हटा डालो।
लेखनी इनकी तोड़ डालो, कि इनके शब्द मरोड़ डालो,
कागज़ मिले कहीं तुमको, हाँ एक-एक टुकड़ा फाड़ डालो।
पुस्तक पड़ी हो किसी कोने में, उसे जलाकर धुआँ बना डालो,
ऐसे तड़पाओ इनको कि आह निकले, हर याद इनकी भूला डालो।

सुनो! बड़ी चतुराई से तुमको ये सब करना होगा,
कि ये जात होती है बड़ी निर्लज्ज, इनको कई बार मारना होगा।
जब मर जाएँगे कलाकार सारे और केवल मनुष्य रह जाएँगे,
तब तुम खुशी मनाना कि शत्रु तुम्हारे धरे के धरे रह जाएँगे!
उस क्षण शायद तुमको अलौकिक आनंद मिलना सम्भव है,
किन्तु सम्भल जाना, कि यही संसार के विनाश का उद्भव है!

-आरती मानेकर

The sequence to this poem will soon be written and published.

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विवशता…कलम की!

क्या है विवशता,
कलम की?
हाँ मेरी ही है ये,
किन्तु,
मेरे ही विचारों को
क्यों न उतार पाती,
कागज पर!
उसी कागज पर,
जिस पर ये लिखती
शब्द कई
और करती बातें
दुनिया से,
दुनिया की।
कभी हँसी बाँटती,
कभी दुःख में भी
वाहवाही बटोरती,
कभी सत्य का समर्थन करें,
कभी कल्पनाओं को
वास्तविकता के पटल पर
उकेरती
और
जीवंत कर देती
किसी की सोई हुईं यादें!

आज तक
किए कलम ने
हैं कितने ही चमत्कार!
किन्तु क्यों सूखी है
स्याही इसकी?
क्यों टूटी है
नोंक?
या शायद
रूठी हुई है
स्वयं कलम?
कि क्यों नहीं
बचा है मेरा अधिकार?
मेरे अंतस के
एकाकीपन में भी
क्यों है इसे
मुझपर धिक्कार?

-आरती मानेकर