भोर

भोर समय जब
सूरज की
सुनहरी किरणें
मेरे कमरे के
रोशनदान से
धीमे-धीमे
दबे पाँव से
यूँ प्रवेश करती
मेरे कमरे में
और बिखेर देती हैं
ज्योत्स्ना नवदिवस की
और मेरी सोती हुई
नन्ही परी के
कोमल रक्तिम
कपोलों पर
दे जाती हैं चुम्बन
प्रेम-प्रकृति का
और भोर में
चिड़ियों के कलरव
का मधुर स्वर
भोर गीत सम
जब पड़ता है
उसके कानों में
गुदगुदी-सा करता होगा
तभी खिलखिला देती है
मेरी नन्ही परी
और उठ जाती है
मीठी नींद से।

-आरती मानेकर

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Lori…..

काहे मेरी बिटिया को नींदिया न आये…
रात सारी बीत जाये, नींदिया न आये…
काहे मेरी गुड़िया को नींदिया न आये…!

खुद भी न सोये वो, मुझे भी जगाये…
खेल सारी रात खेले, मुझको सताये…
मीठी-सी उसकी हँसी, मन को भाये…
काहे मेरी बिटिया को नींदिया न आये…!

आज हरी बगिया में उसको ले जाऊ..
बेला के झूले में उसको झूलाऊ…
काश ये हरियाली उसको सुलाये…
आज मेरी गुड़िया को नींदिया न आये..!

नन्हीं-सी उसकी आँखें, देखे बड़े प्यार से…
“ले ले मुझे गोद में माँ”, बोले बड़े लाड़ से…
आज मेरे आँचल में उसको छुपाऊँगी…
तब जाके बिटिया को नींद आ जायेगी..!

चाँद-तारें रात सारी उसको सुलायें…
फिर पुरवा उसे नींद से जगाये…!

-आरती मानेकर